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शंकर के अंशावतार आदि गुरु शंकराचार्य
Jyotish Sagar
|April-2023
आद्यगुरु श्री शंकराचार्य जयन्ती (25 अप्रैल, 2023) पर विशेष
-
आद्यगुरु ने भारत की चारों दिशाओं में सनातन धर्म के कल्याण के लिए चार मठों की स्थापना की थी। यह मठ पश्चिम में द्वारकाधाम, पूर्व में पुरीधाम, उत्तर में ज्योर्तिधाम तथा दक्षिण दिशा में रामेश्वर धाम में स्थित हैं, जिनके नाम क्रमश: शारदा मठ, गोवर्धन मठ, ज्योतिर्मठ और शृंगेरी मठ हैं।
आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब भारतवर्ष में सनातन धर्म अपने मूल अस्तित्व को खोने लगा था, बौद्ध, जैन आदि धर्मों ने सनातन धर्म की सत्ता को लगभग समाप्त ही कर दिया था, सनातन मतावलम्बी भी वैदिक शास्त्रों को भुलाकर अपने-अपने मत मानने लगे थे, ऐसे समय में एक ऐसे सन्त की आवश्यकता थी, जो वैदिक धर्म को पुनस्स्थापित कर सनातन धर्म का उद्धार कर सके।
वैदिक धर्म की ऐसी दुर्दशा देख स्वयं भगवान् शिव अपने अंशावतार से भारतवर्ष के दक्षिण प्रान्त में केरल राज्य के पूर्णा नदी के तटवर्ती कलादि नामक गाँव में विद्वान और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण श्री शिवगुरु की धर्मपत्नी श्री विशिष्टा देवी के गर्भ से वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन जन्मे। यही बालक आगे चलकर श्रीमद् आद्यगुरु शंकराचार्य जी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उस समय में भारत के दक्षिण राज्यों में वैदिक एवं सनातन धर्म के विद्वानों का अभाव समझा जाता था। इस बात का साक्ष्य यह था कि बड़ेबड़े शास्त्रार्थों में दक्षिण का द्वार हमेशा बन्द ही रहा करता था। उस समय तक दक्षिण भारत में ऐसा कोई विद्वान् नहीं हुआ था, जो सभी वेद-वेदांग तथा उपनिषदों का ज्ञाता हो। इस कमी को सर्वप्रथम आद्यगुरु शंकराचार्य ने ही दूर किया था।
महज 8 वर्ष की आयु में ही सभी वेद-वेदांगों तथा पुराणों का अध्ययन कर लेने के पश्चात् बालक शंकर ने संन्यास ग्रहण कर लिया। बाल्यावस्था में अपने पिता को खोने का दु:ख तथा इकलौती सन्तान होने के पश्चात् भी संन्यास धर्म धारण करना, ऐसा महान् कार्य कोई विभूति ही कर सकती थी।
Denne historien er fra April-2023-utgaven av Jyotish Sagar.
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