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अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे से उपजे खतरे
Jansatta
|January 13, 2026
संचार उपग्रहों से लेकर मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और सैन्य निगरानी तक, आज की आधुनिक दुनिया की धड़कन अंतरिक्ष से जुड़ी है। मगर इस प्रगति के साथ अंतरिक्ष में बढ़ रहे मलबे से सुरक्षा का संकट भी पैदा हो गया है।
अंतरिक्ष अब मानव सभ्यता की दूरस्थ सीमा नहीं रहा। आज यह हमारे रोजमर्रा के जीवन, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। संचार उपग्रहों से लेकर मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और सैन्य निगरानी तक, आधुनिक दुनिया की धड़कन अंतरिक्ष से जुड़ी है। मगर इसी प्रगति के साथ एक ऐसा संकट भी जन्म ले चुका है, जिस पर गंभीरता से चर्चा नहीं होती। वह है- अंतरिक्ष में बढ़ रहा कचरा और उससे अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा को खतरे का मसला। यह केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि मानव जीवन, वैश्विक सहयोग और भविष्य की अंतरिक्ष नीति से जुड़ा प्रश्न है। आज जब दुनिया चंद्रमा, मंगल और उससे आगे मानव की उपस्थिति को लेकर योजना बना रही है, तब यह पूछना अनिवार्य हो जाता है कि क्या हमने पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष को सुरक्षित रखा है?
पिछले छह दशकों में अंतरिक्ष गतिविधियों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। हजारों उपग्रह, सैकड़ों प्रक्षेपण और अनगिनत प्रयोग। इन सबका एक अनचाहा परिणाम है-अंतरिक्ष में फैल रहा मलबा। निष्क्रिय उपग्रह, टकराव से बने टुकड़े और सूक्ष्म कण आज पृथ्वी की कक्षा में एक अनियंत्रित जाल की तरह फैल चुके हैं। समस्या केवल संख्या की नहीं, बल्कि श्रृंखलाबद्ध खतरे की है। दो वस्तुओं की टक्कर से मलबा और बढ़ता है, जो आगे और टकराव को जन्म देता है। वैज्ञानिक इसे 'केसलर सिंड्रोम' कहते हैं। यानी एक ऐसी स्थिति, जहां कक्षा में मलबा इतना बढ़ जाए कि अंतरिक्ष गतिविधियां ही असंभव हो जाएं। इस परिदृश्य में सबसे पहले और सबसे ज्यादा खतरे में होंगे मानवयुक्त मिशन और अंतरिक्ष यात्री।
Denne historien er fra January 13, 2026-utgaven av Jansatta.
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