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फुटपाथ पर जीवन

Jansatta Lucknow

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November 30, 2025

यू ह लेख आपके पास न्यूयार्क से आ रहा है। मैं जब भी यहां आती हूं, तो दुआ करती हूं कि किसी दिन अपने भारत में भी ऐसा महानगर बने।

दुबई बन सकता है अगर न्यूयार्क जैसा, तो मुंबई, दिल्ली, कोलकाता या चेन्नई क्यों नहीं? दुबई को मैंने देखा है उन दिनों से जब यह मछुआरों का छोटा-सा शहर होता था कोई चालीस साल पहले। आज कल्पना करना मुश्किल है कि कभी यहां सिर्फ एक-दो ऊंची इमारतें हुआ करती थीं और गिनती के एक दो माल। ऐसा नहीं है कि हमारे महानगर बदले नहीं हैं इस दौरान। बदले हैं जरूर, लेकिन इसलिए कि हमारी नगरपालिकाएं इतनी नाकारा हैं कि हमने इन महानगरों में वे सुविधाएं नहीं दी हैं जिनके बिना महानगर असली महानगर नहीं बन सकते हैं।

हमारे शासक हर स्तर पर इतने काहिल हैं कि अगर उनके काम को आपराधिक कुशासन कहा जाए, तो गलत न होगा। जब भी कोई छोटा शहर बड़ा बनता है, तो शासक ध्यान में इस बात को रख कर चलते हैं कि यहां रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करना उनका सबसे बड़ा दायित्व है। उनके लिए बिजली-पानी जैसी सुविधाएं' तो हैं ही जरूरी, लेकिन मेरी राय में इससे भी जरूरी है कि उनके रहने के लिए घर बनें जिनका किराया गरीब भी दे सकें। मगर ऐसा न हमारे बड़े शहरों में होता है न छोटे शहरों में।

गरीब लोग मजबूर हैं फुटपाथों पर अपने बसेरे डालने के लिए। जब ऐसा करते हैं, तो उनके पीछे पुलिस लगी रहती है जो उनको कूड़े की तरह समेट कर इधर से उधर फेंकती रहती है। उनके बच्चों को उठा कर ले जाती है और उनके जीवन को एक बुरे सपने में तब्दील कर देती है बिना यह सोचे कि फुटपाथों पर रहना उनका शौक नहीं उनकी मजबूरी है।

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