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सहकार से समृद्धि के समांतर चुनौतियां
Jansatta Kolkata
|August 08, 2025
देश भर में फैली सहकारी समितियां सरकार के 'सहकार से समृद्धि' के लक्ष्य को पूरा करने की दृष्टि से उतनी सफलता प्राप्त नहीं कर पा रही हैं, जितना अपेक्षित है। अधिकांश सहकारी समितियां पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं की कमी से जूझ रही हैं।
दुनिया भर में वर्ष 2025 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इस वर्ष का विषय है- सहकारिता एक बेहतर दुनिया का निर्माण करती है। संयुक्त राष्ट्र ने सहकारिता वर्ष के लिए जो विषय लिया, वह भारत सरकार के 'सहकार से समृद्धि' के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
भारत में सहकारी समितियों की अच्छी-खासी संख्या है। ग्यारह दिसंबर, 2024 को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सहकारिता मंत्री ने बताया था कि देश में कुल 6,21,514 सहकारी समितियां हैं। समितियों का यह तंत्र भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में सहकारिता की महत्त्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करता है। सबसे अधिक कार्यरत सहकारी समितियों वाला राज्य महाराष्ट्र है, सहकारी आंकड़ों के अनुसार यहां सहकारी संस्थाएं दो लाख से अधिक हैं। इन समितियों से जुड़े 7,96,65,337 लोगों के साथ इसका सदस्यता आधार भी सबसे बड़ा है। महाराष्ट्र में इतनी कार्यरत समितियां सहकारी आंदोलनों विशेष रूप से कृषि, डेयरी और ग्रामीण बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में मजबूत संगठनात्मक ढांचे को दर्शाती हैं।
गुजरात की सहकारी संस्था 'अमूल' अपनी सफलता की कहानियों के लिए प्रसिद्ध है। उसने डेयरी उद्योग में नए मानक स्थापित किए हैं। राज्य की सहकारी पहलों ने किसानों, लघु उत्पादकों और ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने में अहम योगदान दिया है। कर्नाटक 38,828 सहकारी समितियों और 2,36,76,736 लोगों की सदस्यता के साथ समितियों की संख्या के मामले में तीसरे स्थान पर है। कर्नाटक में सहकारी क्षेत्र विविध है, जिसमें ऋण समितियां, कृषि विपणन और कृषि उपज का प्रसंस्करण शामिल है। इसने राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ स्थायी आजीविका के अवसर प्रदान करने में भी सहायता की है।
Denne historien er fra August 08, 2025-utgaven av Jansatta Kolkata.
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