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मानवीय क्षमताएं बढ़ाता है योग
Dainik Jagran
|June 21, 2026
शास्त्रों में उल्लेख है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थ के लिए आरोग्य उत्तम मूल यानी मुख्य आधार है।
इसका निहितार्थ यही है कि तन और मन में संतुलन बना रहे। आरोग्य यानी निरोगी रहना विकारों से मुक्त रहना है। यही हमारा स्वभाव है और उसे बनाए रखना हर प्राणी का कर्तव्य होता है। प्रकृति ने हमारी संरचना इसी प्रकार से तैयार की है, लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी युग में उसके अनुरूप जीवन संचालन में समस्याएं आ रही हैं। विकार उत्पन्न हो रहे हैं। विकार बाधक होते हैं, जो आगे बढ़ने में रोड़ा तो अटकाते ही हैं, साथ ही हमारी शक्ति और ऊर्जा का अपव्यय भी करते हैं। इससे हमारा ध्यान अपने लक्ष्य से भटकता है। आज के तेजी से डिजिटल हो रहे युग में बच्चे-बूढ़े सभी आमतौर पर ध्यान के भटकाव की शिकायत करते मिलते हैं। उनका चित्त स्थिर नहीं रह पाता है। इसके फलस्वरूप कोई काम ठीक से नहीं हो पाता और स्मृति भी कमजोर पड़ने लगती है। दूसरी ओर यह सबका अनुभव है कि ध्यानावस्थित या दत्तचित्त होकर ही कोई कार्य सिद्ध किया जा सकता है। 'ध्यान देना' और कुछ नहीं, अपनी चेतना के सतत प्रवाह को एक दिशा में ले जाना है। हम ध्यान को किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना में केंद्रित या फोकस करते हैं। इसी क्रम में अंतर्जगत और बाह्य जगत के साथ तालमेल बैठाना यानी ठीक तरह और ठीक जगह जोड़ना-जुड़ना आज की सबसे बड़ी चुनौती हो रही है। आज पूरे विश्व में मनोरोगियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। ऐसे में योग-शास्त्र और उसकी साधना बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
Denne historien er fra June 21, 2026-utgaven av Dainik Jagran.
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