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राष्ट्रीय सुरक्षा के भरोसे को झटका
Dainik Jagran
|July 26, 2025
क्या वह व्यवस्था, जिसने मुंबई के सबसे घातक ट्रेन हमले के लिए किसी को भी दोषी नहीं पाया, न्याय सुनिश्चित करने का दावा कर सकती है?
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7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोटों के लगभग दो दशक बाद बांबे हाई कोर्ट द्वारा सभी 12 दोषियों को बरी करने के फैसले ने देश को झकझोर दिया। इसमें 180 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 800 से अधिक घायल हुए थे। न्यायिक स्वतंत्रता और कानून का शासन हमारे लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं, पर इतने बड़े मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का ध्वस्त होना न केवल कानूनी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। सितंबर 2015 में आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के नेतृत्व में नौ साल की लंबी जांच के बाद महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) की एक विशेष अदालत ने इन बम विस्फोटों में 13 में से 12 अभियुक्तों को दोषी ठहराया था। पांच को मौत की सजा, सात को आजीवन कारावास और एक को बरी कर दिया गया था। मौत की सजा पाए एक दोषी कोविड के कारण जेल में मर गया था। बांबे हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में ‘पूरी तरह विफल' रहा और सभी 12 लोगों को बरी कर दिया। हाई कोर्ट की टिप्पणियां प्रक्रियात्मक कठोरता पर आधारित हैं। विशेष अदालत ने जिन साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार पाया था, उन्हें ही खारिज करना न केवल पीड़ितों और जांच के लिए अनुचित है, बल्कि खतरनाक भी। बरी किए गए छोटे-मोटे अपराधी नहीं, बल्कि ज्ञात आतंकी संगठनों से जुड़े लोग थे। यह मानना कि वे शांतिपूर्वक समाज में शामिल हो जाएंगे, भोलापन है। आशंका है कि रिहाई उन्हें आतंकी नेटवर्क के साथ फिर से जुड़ने तथा और आतंकी हमलों की साजिश बुनने में सक्षम बना सकती है। हाई कोर्ट का फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कम करता है। जब बड़े आतंकी मामलों में न्याय से इन्कार होता दिख
Denne historien er fra July 26, 2025-utgaven av Dainik Jagran.
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