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भारत के लिए चेतावनी है शुल्क का झटका
Business Standard - Hindi
|September 01, 2025
भारतीय निर्यात पर अब अमेरिका में 50 फीसदी का आयात शुल्क (टैरिफ) लग रहा है। यह दुनिया के लगभग किसी भी अन्य देश की तुलना में एक बड़ी बाधा है।
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नतीजतन, सरकार को यह विचार करना होगा कि इससे कैसे निपटा जाए। हालांकि सरकार को राजनीतिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा, लेकिन आर्थिक दृष्टिकोण से यह लक्ष्य स्पष्ट है कि नुकसान कम करना है ताकि भारत तेजी से विकास के रास्ते पर लौट सके। हालांकि यह काम जटिल है क्योंकि घरेलू अर्थव्यवस्था में चुनौती के साथ विदेशी बाजारों में भी संभावनाएं कम हो गई हैं।
आखिर टैरिफ का झटका वास्तव में कितना गंभीर है? कई विश्लेषकों का तर्क है कि इसका असर सीमित होगा। वे बताते हैं कि अमेरिका को होने वाला वस्तुओं का निर्यात भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सिर्फ 2 फीसदी है और इसमें से भी केवल दो-तिहाई ही प्रभावित होगा, क्योंकि दवाओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम उत्पादों को छूट दी गई है।
हालांकि, यह तर्क बड़ी तस्वीर को अनदेखा करता है। अमेरिका सिर्फ भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार नहीं है बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक भागीदार भी है। नतीजतन, टैरिफ का झटका सिर्फ व्यापार को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि यह निवेशकों के भरोसे को हिला देगा और इससे आपूर्ति श्रृंखला भी बाधित होगी और भारत की दीर्घकालिक निर्यात प्रतिस्पर्धा भी कमजोर होगी। असली जोखिम इन दूरगामी प्रभावों में निहित है, जो तात्कालिक आंकड़ों से कहीं अधिक है। यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों है, तीन तरह की कंपनियों की स्थिति पर विचार करते हैं।
इस कड़ी में सबसे पहले और स्पष्ट तौर पर प्रभावित होने वालों में वैश्विक निर्माता कंपनियां शामिल हैं। भारत खुद को अगले वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में पेश कर रहा था, खासतौर पर उन कंपनियों के लिए जो अमेरिका को निर्यात करती हैं या चीन से अपनी विनिर्माण इकाइयां हटाना चाहती हैं। इसे भारत की वृद्धि के लिए संभावित तौर पर खेल में बदलाव लाने वाली रणनीति के तौर पर देखा जा रहा था। एक युवा और तेजी से कुशल हो रहे कार्यबल तथा लोकतांत्रिक स्थिरता के साथ, यह लाभ स्पष्ट रूप से दिख रहा था। हालांकि, 50 फीसदी के अमेरिकी शुल्क ने अब इस फायदे को खत्म कर दिया है।
Denne historien er fra September 01, 2025-utgaven av Business Standard - Hindi.
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