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प्रतिरोध की नैतिक दृष्टि

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November 10, 2025

भारतीय सामाजिक यथार्थ के दर्पण में लास्लो क्रॉस्नॉहोरकै को पढ़ना नैराश्य के रेगिस्तान में मेघों की आवाज के कंठहार जैसा

- त्रिभुवन वरिष्ठ पत्रकार, कवि, कहानीकार, स्तंभकार

प्रतिरोध की नैतिक दृष्टि

कुछ लेखक ऐसे होते हैं, जो भविष्य से आते प्रतीत होते हैं। वे घटनाओं के नहीं, आत्मा की दर्दीली अंधेरी अवस्थाओं के भविष्यवक्ता होते हैं। लास्लो क्रॉस्नॉहोरकै ऐसे ही लेखक हैं, जिन्हें इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। आज जब हम भारत के व्याकुल लोकतंत्र में उन्हें पढ़ते हैं, तो संकल्पधर्मा चेतना का एक रक्तप्लावित स्वर अपने ही भीतर अनुभूत होता है। उन्होंने बहुत पहले उस अर्थ, क्षय और आत्म के पतन को देख लिया था, जो तब घटता है, जब विचारधारा के नाम पर मारकाट करती हुई सदियों की रक्तरंजित चीख ही भाषा से लेकर शासन का एकमात्र रूप बन जाती है।

क्रॉस्नॉहोरकै की लंबी वाक्य रचनाएं सांस रोक देने वाली हैं; मानो वाक्य स्वयं नैतिक पतन से बचने के लिए संघर्ष कर रहे हों। और उसी संघर्ष में हम अपने समय के प्रकंपन को पहचानते हैं। हम देखते हैं कि किस तरह एक गरिमाशील अतीत एक दर्दभरे उद्धत अंधेरे वर्तमान के सामने करबद्ध खड़ा है।

थकी हुई सभ्यता

क्रॉस्नॉहोरकै का प्रारंभिक हंगरी 1980 के दशक का था, जब उनके लेखन के माध्यम से अंधियारे जीवन के कई अछूते पहलू सामने आए। उनका लेखन उस राजनैतिक थकान का भू-दृश्य है, जहां समाजवाद के नारे अनुष्ठान बन चुके थे और भाषा में भरोसा समाप्त हो चुका था। उनके उपन्यास सैटनटैंगो और द मेलन्कॉली ऑफ रेजिस्टेन्स एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहां परिवर्तन की कोई गति नहीं, बस क्षय की तेज रफ्तार है। कीचड़ से ढंके कस्बे, कागजों में डूबे अफसर, प्रतीक्षा में जकड़े लोग। न वहां क्रांति है, न मुक्ति। केवल एक जड़ीभूत ठहराव और गहन नैराश्य है, जो धीरे-धीरे नागरिकों की नसों में उतर गया।

यदि हम हंगरी के उस धूसर परिदृश्य को भारत की भीड़ भरी सड़कों से बदल दें, तो थकान और यथास्थितिवाद वैसे ही बेचैन चील जैसे बने रहते हैं। यहां भी जनता का बड़ा हिस्सा चट्टानी जड़ता और निरंतर आशावादी नैराश्य के आत्मालाप में जी रहा है। लोकतंत्र के वादे खोखले हो चुके हैं। विचारधारा अभिनय बन चुकी है और भाषा, जो कभी प्रतिरोध का औजार थी, अब यशोगान की आज्ञाकारिता का हथियार है। विचारहीनता के तंग कमरों में काफी कुछ समान है उस समय के हंगरी और आज के भारत में।

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