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कछुआ चाल की लक्जरी
India Today Hindi
|November 05, 2025
देश में 180 किमी/घंटा की रफ्तार वाली बताई गई इस लकदक ट्रेन की गति बमुश्किल आधी है. चमचमाते डिब्बे इस सचाई को नहीं छिपा पाते कि ट्रैक, सिग्नल और सिस्टम अब भी बहुत पुराने
जरा सोचिए कि 200 किमी/घंटा की रफ्तार वाली टेस्ला कार खरीदें, और गड्डों से गुजरते हुए ऑटो-रिक्शा की भीड़भाड़ में वह महज 20 किमी/घंटा की रफ्तार से रेंग पाए तो क्या कहेंगे. ट्रैफिक में घुसते ही लाजवाब इंजीनियरिंग का रोमांच गायब हो जाता है. देश की बहुचर्चित प्रमुख ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस में सफर करने का अनुभव बिल्कुल ऐसा ही होता है. उसे डिजाइन तो 180 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने के लिए किया गया है मगर ट्रैक तथा सुरक्षा के मद्देनजर आधिकारिक तौर पर 160 किमी/घंटा की रफ्तार से चलाने की इजाजत है. फिर भी, उसके चमचमाते नारंगी रैक औसतन सिर्फ 76 किमी/घंटा की रफ्तार ही पकड़ पाते हैं, जो 1969 में शुरू की गई राजधानी एक्सप्रेस से बमुश्किल थोड़ी ही तेज है. गजब का विरोधाभास है: विश्वस्तरीय तकनीक और खटारा सिस्टम.
वंदे भारत अंदर और बाहर दोनों तरफ से चकाचौंध पैदा करती है. सुघड़ मुखड़ा, हवाई जहाज जैसी सीटें, वाई-फाइ और चिकना-चुपड़ा इंटीरियर. क्या नहीं हैं. यात्री सेल्फी क्लिक करते हैं, यूरोप की विख्यात हाइ-स्पीड ट्रेनों के भारतीय संस्करण की तरह प्रचारित ट्रेन में चढ़ने के लिए रोमांचित होते हैं. फरवरी 2019 में उसे हरी झंडी दिखाए जाने के बाद से 2.5 करोड़ से ज्यादा लोग वंदे भारत की सवारी कर चुके हैं. हाल ही दिल्ली से कटरा तक की यात्रा कर लौटीं उत्साहित मानसी कहती हैं हर 16-कोच सेट की कीमत अब 115-134 करोड़ रुपए के बीच है, जो आम ट्रेन की कीमत से कई गुना ज्यादा है. सरकार की योजना 2047 तक ऐसी 4,500 ट्रेनें चलाने की है जो भारतीय रेल यात्रा के कायाकल्प के लिए अरबों का निवेश करेगी. ट्रायल रन ने 183 किमी/घंटा को भी छू लिया था, जिसे 'मेक इन इंडिया' इंजीनियरिंग की सराहना के रूप में लिया गया. बड़े धूम-धड़ाके से बताया गया कि वंदे भारत के साथ देश हाइ-स्पीड ट्रेनों के दौर में प्रवेश कर जाएगा.
Denne historien er fra November 05, 2025-utgaven av India Today Hindi.
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