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भारत के लिए लाभकारी है ताइवान पर अमेरिकी नीति

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September 2022

1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने जीत हासिल कर राजधानी बीजिंग पर कब्जा कर लिया और हार के बाद सत्ताधारी नेशनलिस्ट पार्टी (कुओमिंतांग) के लोगों को भागना पड़ा। कुओमिंतांग पार्टी के सदस्यों को ताइवान में जाकर शरण लेनी पड़ी और वहीं पर उन्होंने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। उसी वक्त से चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है जबकि ताइवान के लोग अपने को आजाद देश मानते हैं।

- विवेक ओझा

भारत के लिए लाभकारी है ताइवान पर अमेरिकी नीति

अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी द्वारा ताइवान की यात्रा पूरी करने के बाद उनके वापस जाने के कुछ ही घंटों के भीतर चीन ने अपने 27 युद्धक विमान ताइवान के एयर डिफेंस जोन में भेज दिए। नैंसी पेलोसी की यात्रा के विरोध में चीन ने ताइवान से रसदार फलों, मछली और अन्य खाद्य पदार्थों के आयात पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। चाहे तवांग और लद्दाख में दलाई लामा को न जाने देने के लिए चेतावनी देने की बात हो या फिर ताइवान में नैंसी पेलोसी को न जाने देने के लिए अमेरिका को चुनौती देने की बात हो, एक बात तो साफ है कि विवादों में चीन की गहरी दिलचस्पी है। दरअसल, नैंसी पेलोसी चीन साम्राज्यवादी और आक्रामक नीतियों के खिलाफ काफी मुखर रही हैं और दलाई लामा से उनके संपर्कों के चलते भी चीन नैंसी पेलोसी की गतिविधियों के प्रति सतर्क रहा है। 2008 में नैंसी पेलोसी ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला की यात्रा की थी और उन्होंने दलाई लामा से मुलाकात की थी। ऐसा माना जाता है कि नैंसी पेलोसी और दलाई लामा के बीच नजदीकी को चीन पसंद नहीं करता। कानून निर्माता और हाउस स्पीकर के रूप में नैंसी पेलोसी ने कई बार तिब्बत के धर्मगुरु की तारीफ की है और एक्टर रिचर्ड गेर और उमा थुरमन के साथ मिलकर तिब्बत के मुद्दे पर जागरूकता को बढ़ाने के लिए भी काम किया है।

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