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राखी- रक्षाकवच से रक्षाबंधन तक

Sadhana Path

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August 2025

ऐसा माना जाता है कि राखी ने देवताओं से मानवों तक का सफ़र तय किया है। जानिए, इसी बारे में-

राखी- रक्षाकवच से रक्षाबंधन तक

हमारे जनजीवन में पर्वों का प्राचीन काल से ही खास महत्व रहा है। इन्हीं पर्वों के माध्यम से सोई हुई चेतना पुनः जाग उठती है तथा हमारे अंदर शक्ति और साहस का संचरण होता है। भारतीय लोक जीवन के इन्हीं पर्वों में भाई- बहन के स्नेह का परिचायक और कच्चे धागों का पवित्र बंधन 'रक्षा बंधन’ या 'राखी' का अपना ही एक विशेष महत्व है। श्रावण मास में मनाई जाने की वजह से इसे 'श्रावणी' भी कहते हैं। एक तरफ जहां यह स्नेह तथा उत्साह का पर्व है, वहीं दूसरी तरफ यह बलिदान, शक्ति, साहस, विजय तथा प्रतिज्ञा का भी त्योहार है।

पुराणों में रक्षाबंधन

रक्षा बंधन पर्व की ऐतिहासिकता अत्यंत पुरातन है। ऐसी कहानी पुराणों में मिलती है कि देवता तथा दानवों में बारह सालों तक भयंकर युद्ध होता रहा। इतना लंबा वक्त गुजर जाने पर भी हार-जीत का निर्णय नहीं हो पा रहा था, तब देवताओं के गुरु बृहस्पति जी ने देवताओं को रक्षा सूत्र बंधवाने का परामर्श दिया। देवराज इन्द्र जब देवासुर संग्राम में जा रहे थे तो उनकी पत्नी शची ने पूरे विधि-विधान से विजय की कामना करते हुए इन्द्र तथा सारे देवताओं की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और कहा-

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