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धार्मिक व्यवस्था की रीढ़ है चार आश्रम

Sadhana Path

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June 2025

यह बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है कि वैचारिक विकास के क्रम में भारतीय मनीषा ने बहुत जल्दी ही अपना लक्ष्य निश्चित कर लिया था।

- - सुशील सरित

धार्मिक व्यवस्था की रीढ़ है चार आश्रम

यदि हम वैदिक कालीन धार्मिक व्यवस्था का विश्लेषण करें तो बड़ी आसानी से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि हमारी संपूर्ण धार्मिक व्यवस्था जिसकी रीढ़ आश्रम व्यवस्था थी और जिसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष था, वस्तुतः मानव मात्र के शारीरिक और उससे भी अधिक मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चैतन्यता को समर्पित थी। भारतीय वैदिक ऋषियों ने हर संभव प्रयत्न लोकहित और लोक मानस की सशक्तता के प्रति प्रतिबद्ध होकर किया।

आइये, अब इस बिन्दु पर जरा विस्तार से चर्चा करें। मानव और मानव ही क्या प्रत्येक चैतन्य प्राणी के सम्मुख जो सबसे विकराल भय सर्वप्रथम सामने आकर खड़ा हुआ वह मृत्यु थी और यह भय संभवतः चेतना की पहली सीढ़ी पर ही प्राणी मात्र के लिए चुनौती के रूप में सामने आ गया था। जब और जितने भी समय पूर्व पहली बार जिस किसी ने भी सर्वप्रथम अपने सामने अपने जैसे या अपने से भिन्न प्राणी का जीवन समाप्त होते देखा होगा उसी समय अथवा उसके कुछ ही समय बाद जब ऐसी दूसरी या तीसरी घटना हुई होगी तभी उसे अनुभव हुआ होगा कि मृत्यु एक अनिवार्य सत्य है और तभी मृत्यु, भय के सबसे बड़े प्रतीक रूप में उसके सामने आई होगी और तभी से प्राणी ने इस भय का सामना करने के लिए अपनी तत्कालीन बौद्धिक क्षमतानुसार प्रयत्न करने प्रारंभ कर दिए होंगे।

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