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कृषि से जुड़ी आबादी को मिले विकास का फायदा
Modern Kheti - Hindi
|October 15, 2023
सरकार साल में दो बार, रबी और खरीफ सीजन के लिए अलग-अलग घोषित करती है, भी हमेशा सवालों के घेरे में रही है। जबकि सीएसीपी उत्पादन लागत और समग्र मांग पूर्ति की स्थिति के लिए अखिल भारतीय भारित औसत के आधार पर कीमतें तय करता है और वैश्विक कीमतों को भी देखता है, इस पद्धति पर लगातार सवाल उठे हैं।
बीते दिनों एक राष्ट्रीय दैनिक में प्रकाशित पहले पन्ने की रिपोर्ट ने मेरी बात की ही पुष्टि की गई कि 'कृषि को इतने वर्षों में जान-बूझकर गरीब रखा गया है।' जब तक अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के हाथों में कृषि महज महंगाई नियंत्रण के एक औजार के रूप में रहेगा तब तक किसानों को मुश्किलों की उस गहरी दलदल से केवल कोई चमत्कार ही बाहर निकाल सकता है। अपनी इस मौजूदा स्थिति के लिए किस्मत को ही दोष देने वाले किसान शायद ही कभी समझ सकें कि कैसे हकीकत में वे उस दोषपूर्ण आर्थिक प्रारूप के शिकार हैं जो उनके समाज में निचले पायदान पर जैसे-तैसे गुजर-बसर को यकीनी बनाता है।
खरीफ सीजन की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी के प्रस्ताव पर नीति आयोग, वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग और वाणिज्य मंत्रालय ने अन्य मुद्दों के साथ ही बढ़ती मुद्रास्फीति को चिंता का विषय बताते हुए शंकाएं जताई थीं। बीती 29 अगस्त को राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जहां वाणिज्य मंत्रालय ने सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग के लिए विश्व व्यापार संगठन के मानदंडों के तहत दायित्वों की बात कहकर आपत्ति जताई, वहीं खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय ने मूल्य वृद्धि के परिणामस्वरूप अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की बात सामने रखी। संक्षेप में, ऐसा लगता है कि प्रत्येक संबंधित मंत्रालय को किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में अनुमानित बढ़ोतरी से समस्या थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने आखिरकार खरीफ सीजन के एमएसपी को 6 से 10 प्रतिशत के बीच कीमतों में वृद्धि को मंजूरी दे दी। यह देखते हुए कि कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा गणना की गई उत्पादन लागत में भी उसी अनुपात में वृद्धि हुई है, एमएसपी की घोषणा मुश्किल से उस बढ़ी हुई लागत को पूरा करती है जो किसानों ने फसल उगाने में लगाई।
Denne historien er fra October 15, 2023-utgaven av Modern Kheti - Hindi.
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