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धान- गेहूं फसल चक्र में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती
Modern Kheti - Hindi
|1st March 2023
आज के संदर्भ में धान-गेहूं फसल चक्र में विविधीकरण की ओर प्रयास किये जा रहे हैं क्योंकि धान-गेहूं फसल चक्र के लम्बे समय से प्रचलित होने के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी, भूमिगत जल स्तर में गिरावट, खरपतवारों में प्रतिरोधकता की समस्याओं के साथ-साथ धान व गेहूं की उत्पादकता भी स्थिर हो गई है।
लगातार कृषि लागत में वृद्धि से प्रति इकाई मुनाफा भी घट रहा है। इसके अलावा हमारे देश में कृषि पर निर्वहन करने वाली करोड़ से ज्यादा जनसँख्या लगातार घटी हुई जोत सूखे व बाढ़ का प्रकोप विश्व व्यापारीकरण की चुनौतियां आदि कारकों ने कृषकों व उनका हित सोचने वालों को नवीनतम व उन्नत कृषि तकनीकों के बारे में सोचने पर बाध्य कर दिया है। कम संसाधनों का प्रयोग करके भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रख कर कम लगत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। इन परिस्थितियों में अनाज वाली फसलों के साथ दलहनी फसलों को उगाना लाभदायक है।
धान-गेहूं फसल चक्र में ग्रीष्मकालीन मूंग को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है क्योंकि गेहूं की कटाई व धान की रोपाई के बीच में दिन तक खेत खाली रहते हैं • जिस दौरान किसान सांठी धान लगाने की कुप्रथा में लिप्त रहते हैं। ग्रीष्मकालीन मूंग की काश्त करने से ना केवल सांठी धान लगाने की कुप्रथा कम होगी बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ने के साथ-साथ जल जैसे प्राकृतिक संसाधन को भी बचाया जा सकेगा। ग्रीष्मकालीन मूंग उगाने के कई फायदे हैं :
ग्रीष्म में खरपतवारों का प्रकोप कम होता है
कम आर्द्रता के कारण बीमारियों व कीड़ों का प्रकोप कम होता है
जल्दी पकने से वर्षा आदि से बचाव हो जाता है
प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग हो जाता है
किसान की अतिरिक्त आय के साथ-साथ देश की विदेशी मुद्रा की बचत होती है व भूमि सुधार होता है।
इस तरह ग्रीष्मकालीन मूंग प्रचलित धान गेहूं के फसल चक्र में मूल्य संवर्धन का कार्य करती है। धान गेहूं कृषि पद्धति के आलावा तोरिया, आलू, सरसों, मटर, गन्ना व कभी-कभी रबी की फसल खराब होने के कारण भी खेत मार्च महीने से अगली खरीफ की फसल लगने तक खाली रहते हैं। ऐसे खेतों में ग्रीष्मकालीन मूंग को उगाकर उनका सदुपयोग किया जा सकता है।
Denne historien er fra 1st March 2023-utgaven av Modern Kheti - Hindi.
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