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उन वीर पुरुष की गाथा, जिन्होंने फल नहीं चाहा, केवल कर्तव्य निभाया

Rishi Prasad Hindi

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July 2025

जसवंत सिंह जोधपुर के नरेश थे। उनके सेनापति वीर दुर्गादास बड़े गजब के वफादार रहे !

उन वीर पुरुष की गाथा, जिन्होंने फल नहीं चाहा, केवल कर्तव्य निभाया

जसवंत सिंह की मृत्यु हो गयी, उनका पुत्र अजीत सिंह छोटा था। औरंगजेब ने अपना कूटनीति का दाँव फेंका। दुर्गादास को कहा : “जसवंत सिंह का पुत्र अभी छोटा है, उसे दिल्ली भेज दो। उसकी पढ़ाई-लिखाई और भरण-पोषण यहाँ करेंगे। और जब योग्य हो जायेगा युवराज तब उसको गद्दी पर बिठायेंगे।”

दुर्गादास ने देखा कि यह कूटनीति है, वे औरंगजेब के स्वभाव को जानते थे। इन मुगलों ने, इन शहजादों ने, जहाँपनाहों ने कितना-कितना भारतीय संस्कृति वालों का शोषण किया है, उससे वीर दुर्गादास परिचित थे। वे नहीं ले गये अजीत सिंह को। औरंगजेब ने कई दाँव-पेच लड़ाये लेकिन वीर दुर्गादास ने शपथ खा रखी थी कि ‘हमने जिनका अन्न खाया है वे भले हमारे सामने सशरीर नहीं हैं किंतु उनकी स्मृति दिलानेवाले उनके वारिस अजीत सिंह तो हैं, वे ही मेरे होनहार स्वामी हैं। मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उनकी रक्षा करता रहूँगा।’

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