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श्रीकृष्ण के विराट् स्वरूप
Jyotish Sagar
|August 2025
भगवान् श्रीकृष्ण ने मुख्यरूप से चार बार अपना विराट् स्वरूप दिखलाया था।
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पहला ब्रज में माता यशोदा को, दूसरा कौरवों की राजसभा में, तीसरा युद्धक्षेत्र में अर्जुन को और चौथा द्वारका के मार्ग में महर्षि उत्तंक को। चारों ही स्थानों पर भगवान् के इन विराट् स्वरूपों का वर्णन संक्षेप में यहाँ कर रहे हैं।
ब्रज में विराट् स्वरूप
भगवान् श्रीकृष्ण अपने बचपन में खेलते-खेलते मिट्टी खा गए, जिसकी शिकायत बलराम जी और अन्य बाल सखाओं ने माता यशोदा से की थी। यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को डाँटते हुए कहा कि 'तुमने फिर मिट्टी खाई।' इस पर श्रीकृष्ण ने लगभग रोते हुए से कहा कि 'मैया मैंने मिट्टी नहीं खाई। ये लोग झूठ-मूठ ही मेरा नाम लगाते हैं। विश्वास नहीं हो, तो मेरा मुँह देख लो।'
इतना कहकर भगवान् से जब अपना मुँह खोला तो माता यशोदा हक्की-बक्की रह गई। श्रीकृष्ण के मुख में उन्होंने देखा कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पहाड़, द्वीप, समुद्र, वायु, अग्नि, समस्त देवगण, सम्पूर्ण चराचर जीव, सभी कुछ वहाँ दिखाई दे रहा है। यशोदा सोचने लगीं कि मैं जिसे अपना बालक समझती थीं, वह बालक नहीं वरन् वह तो स्वयं परमात्मा है। यह सारा संसार उसमें समाहित है। यशोदा ने प्रणाम कर कहा कि 'हे जगन्नाथ! मैं तुम्हारे शरणागत हूँ।' परन्तु भगवान् ने इसे अपनी मानव लीला में बाधा समझा और अपना विराट् स्वरूप वापस ले लिया तथा माता पर पुनः अपनी माया फैला दी। पुत्र स्नेह से माता का हृदय उमड़ आया, उसने श्रीकृष्ण को गोद में उठा लिया और उनका मुख चूमने लगी। यह कथा श्रीमद्भावगत के दशम स्कन्ध के अध्याय आठ में मिलती है।
कौरव राजसभा में विराट् स्वरूप
このストーリーは、Jyotish Sagar の August 2025 版からのものです。
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