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मृत्यु से परे की सत्यता!
Jyotish Sagar
|May 2024
उसने मेरे पैरों पर मकड़े से चलाए और मेरे दोनों पैर स्थिर कर दिए। जब मैंने क्षमा माँगी, तो वह मेरे सामने आ गया।
श्री मद्भागवत गीता का एक श्लोक है :
कार्यकरणकर्तृव्ये हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
अर्थात् प्रकृति सम्पूर्ण प्राकृत कार्य एवं कारणों की हेतु कही गई है और पुरुष (जीवात्मा) इस संसार में विविध सुख एवं दुःख को भोगने के लिए है, अतः स्पष्ट है कि जीव स्वयं ही जन्म-जन्मान्तरों में अर्जित पाप एवं पुण्य की बदौलत अच्छी और बुरी योनियों में भटकता रहता है और जीव को जो भी योनि प्राप्त होती है, उस योनि में वह अपना प्रारब्ध कष्ट काटता है। उस कष्ट का कारण सिर्फ वह जीव है, न कि शरीर। एक बार जिस देह में जीव को डाल दिया, तो वह जीव प्रकृति के वश में हो जाता है और वहाँ स्वयं जीव का कुछ भी उपाय अथवा जोर नहीं चलता है और वह उसी प्राप्त देह के अनुसार शारीरिक भोग को भोगता रहेगा। उदाहरण के तौर पर मान लो किसी जीव को कुत्ते की योनि मिली, तो वह कुत्ते के शरीर का भोग करेगा। कारण कि प्रकृति द्वारा निर्मित देह प्राकृतिक नियम के अनुसार ही चलेगी। आगे कर्मयोग के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में जो कहा है, उसे निम्नलिखित कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
जब राजा अकबर तानसेन से पूछते हैं कि तानसेन बताओ, तुम श्रेष्ठ हो कि तुम्हारा गुरु हरिदास श्रेष्ठ है। तब तानसेन ने कहा कि मुझे अपना पद एवं प्रतिष्ठा खोने का डर सदैव लगा रहता है, लेकिन मेरे गुरु हरिदास ईश्वर अर्पण बुद्धि को रखते हुए कर्म करते हैं अर्थात् वह अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को अर्पण करते हुए करते हैं और जो कर्मफल उन्हें प्राप्त हो रहे हैं, जो भी उन्हें मिल रहा है, उसे वे 'ईश्वर-प्रसादम्” मानकर ग्रहण करते हैं। इसलिए हे राजन! मेरे गुरु मुझसे बहुत श्रेष्ठ हैं। वे कर्म कुशल योगी हैं अर्थात् ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ से युक्त हैं।

このストーリーは、Jyotish Sagar の May 2024 版からのものです。
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