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सरकार की नीति में बदलाव और असर
Business Standard - Hindi
|September 26, 2025
मांग को बढ़ावा देने के लिए कर लाभों का सहारा लेना यह दिखाता है कि सरकार नया रास्ता अपना रही है लेकिन यह कई नई चुनौतियों से रूबरू करा सकता है। बता रहे हैं एके भट्टाचार्य
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रविवार को राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन से एक प्रमुख निष्कर्ष यह निकल कर आया कि सरकार ने आर्थिक वृद्धि पटरी पर लाने और उसे निरंतर गति देने के लिए अपनी नीति में थोड़ी तब्दीली की है। बेशक, उनके संबोधन का मुख्य उद्देश्य वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद द्वारा जीएसटी दरों में संशोधन और 450 से अधिक वस्तुओं एवं सेवाओं पर दरों में कटौती के निर्णय के संभावित प्रभाव से राष्ट्र को अवगत कराना था। तथाकथित 'बचत का उत्सव,' जो प्रधानमंत्री की नजर में जीएसटी दर में कटौती से शुरू होने वाला था, घोषित लक्ष्य था। लेकिन उस लक्ष्य के पीछे उनकी सरकार की आर्थिक नीति में बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
कोविड महामारी के बाद के वर्षों में मोदी सरकार ने आर्थिक वृद्धि पटरी पर लाने के लिए दोआयामी दृष्टिकोण अपनाया। एक तरफ केंद्र सरकार ने अपने राजकोषीय घाटे में लगातार कमी लानी शुरू कर दी जो 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 9.2 फीसदी से अधिक था और 2024-25 में कम होकर 4.77 फीसदी तक सिमट गया। दूसरी तरफ, सरकार ने बेहतर व्यय मिश्रण के माध्यम से राजकोषीय मजबूती हासिल करने की कोशिश की। इस अवधि के दौरान पूंजीगत व्यय में लगातार वृद्धि होने के बावजूद राजस्व व्यय में कमी आई।
केंद्र सरकार का राजस्व व्यय वर्ष 2020-21 में जीडीपी के 15.5 फीसदी से घटकर 2024-25 में 10.9 फीसदी रह गया जबकि उक्त अवधि में ही उसका पूंजीगत व्यय जीडीपी के 2.15 फीसदी से बढ़कर 3.18 फीसदी हो गया। बेशक राजस्व में तेजी से काफी मदद मिली और इससे पिछले कुछ दशकों में केंद्र सरकार के राजस्व घाटे में सर्वाधिक तेजी से कमी आई। यह 2020-21 में जीडीपी के 7.3 फीसदी से कम होकर 2024-25 में 1.71 फीसदी रह गया। इस तरह, कोविड महामारी के बाद के वर्षों में सरकार की नीति राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने, अपना राजस्व व्यय कम करने और निजी क्षेत्र की हिचकिचाहट के बीच बुनियादी ढांचे के निर्माण पर अधिक खर्च करने पर केंद्रित थी।
このストーリーは、Business Standard - Hindi の September 26, 2025 版からのものです。
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