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जीएसटी 2.0 आर्थिक वृद्धि में ला पाएगी तेजी?

Business Standard - Hindi

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September 06, 2025

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था में मौजूदा चार मुख्य दरें (5, 12, 18 और 28 फीसदी) अब दो मुख्य दरों 5 फीसदी और 18 फीसदी में तब्दील हो जाएंगी। तंबाकू जैसी हानिकारक वस्तुओं पर 40 फीसदी जीएसटी के अलावा अतिरिक्त शुल्क भी लगाया जाएगा।

सरकार ने कहा कि इस कदम का मकसद अनुपालन सरल बनाना, जीएसटी व्यवस्था में मौजूद त्रुटियां दूर करना और उपभोक्ताओं के हाथ में अधिक रकम देना है। हालांकि, निवेशकों एवं अर्थशास्त्रियों को यह घोषणा कुछ जानी-पहचानी लगी। छह वर्ष पहले 20 सितंबर, 2019 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कंपनी कर 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी और नए विनिर्माताओं के लिए इसे 25 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी कर भारतीय उद्योग जगत को चौंका दिया था। कई कंपनियों के लिए यह कटौती अचानक बड़े मुनाफे की सौगात लेकर आई। उस दिन बीएसई सेंसेक्स 5.3 फीसदी उछल गया और फिर अगले सोमवार को इसमें 2.8 फीसदी की तेजी दर्ज हुई। मगर निवेशकों एवं कंपनियों का उत्साह कुछ दिनों बाद काफूर हो गया।

आखिर, इसकी क्या वजह थी? कंपनी कर में कटौती एक तत्काल प्रतिक्रिया थी और शिथिल पड़ती अर्थव्यवस्था संभालने के लिए सरकार द्वारा आननफानन में उठाया गया कदम था। उस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर कम होकर 5 फीसदी (पुरानी गणना विधि के अनुसार 3.5 फीसदी) तक सिमट गई। देश से निर्यात कमजोर हो गया था, बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही थी और वाहनों की बिक्री घट कर दो दशकों के निचले स्तर पर आ गई थी।

वित्तीय क्षेत्र संकट में था और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) चरमरा गई थीं। कर घटाने के पीछे यह तर्क था कि इससे कंपनियां अपने पास जमा रकम नई परियोजनाओं में निवेश करेंगी जिससे रोजगार के अवसर सृजित होंगे। मगर वास्तविकता यह है कि कंपनियों के पास जमा नकदी का भंडार

धनाढ्य कंपनियों की विस्तार योजनाओं को आगे नहीं बढ़ाती हैं बल्कि अर्थव्यवस्था में वाजिब मांग से ही ऐसा हो पाता है। जिसकी आशंका थी वही हुआ, कंपनी कर में कटौती के बावजूद कंपनियां विस्तार योजनाओं की राह में आगे नहीं बढ़ीं।

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