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सत्य का ज्ञान ही सब दुःखों से दिला सकता है मुक्ति
DASTAKTIMES
|January 2025
भले ही कोई किसी जाति, पन्थ, राष्ट्र अथवा विशेष प्रवृत्तियों वाला व्यक्ति हो और बदले में धन अथवा अन्य किसी भी रूप में किसी प्रतिफल की आकांक्षा न करते हुए मानवमात्र की सेवा ही उसके जीवन का उद्देश्य हो, यही यथार्थ सेवा है।
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जो सेवा मैं करना चाहता हूं, वह यह है कि मानव जीवन में समस्त दुखों की बहुतायत निवृत्ति हो और सभी प्रकार के सुख उपलब्ध हों, जीवन में बुढ़ापा और व्याधि, अशान्ति, अभाव, भय और अपमान तथा सम्बन्धियों के वियोग का दुःख न रहे, शक्ति, ज्ञान और आनन्दयुक्त मानव का निर्माण और सुन्दर समाज की रचना हो। गत पचास वर्षों से मैंने अध्ययन मनन तथा स्वयं अपने और अपने मित्रों के ऊपर शास्त्रसम्मत और वैज्ञानिक प्रयोग करके समाज में व्याप्त घोर दुःख के मूल कारणों तथा उनके दूर करने के उपाय जानने का सम्यक प्रयत्न किया है।
अपनी इस खोज से मुझे जो जानकारी मिली, वह वर्तमान समाज में भोजन, औषधि, धन, पुस्तकें तथा ऐसी दूसरी चीजों की उपयोगिता के विषय में प्रचलित धारणाओं के बिल्कुल विपरीत है। लेकिन मुझे मिली जानकारी मापदण्ड के अनुसार आश्चर्यजनक है। इन उपलब्धियों में कुछ इस प्रकार है।
साधकों के शरीर बिना औषधोपचार सभी प्रकार के रोगों से, यहां तक कि असाध्य कहे जाने वाले रोगों से भी मुक्त हो गए हैं। शक्ति प्राप्त करने के लिए साधकों की भोजन की आवश्यकता घटती जा रही है। उनमें से कुछ तो जिनमें महिलाएं भी हैं, ऐसी शारीरिक स्थिति प्राप्त कर चुके हैं कि अपने सारे दैनिक कार्य, बिना किसी शारीरिक व्यवधान के कई दिनों तक केवल हवा के सहारे और कई सप्ताह तक केवल जल पीकर करते रहने में समर्थ हैं। साधक लगातार अट्ठारह घंटे बिना बीच में जलपान की आवश्यकता अनुभव किए ही काम कर सकते हैं, फिर भी उन्हें थकावट नहीं सताती। साधकों का मन क्रमशः पूर्णतया चिन्तामुक्त और हर प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रभाव से स्वतंत्र हो रहा है। साधक बुद्धि में अलौकिक प्रकाश अनुभव करते हैं, जिससे वे अब प्रतीक होने वाले सत्य और यथार्थ सत्य का विवेचन करने में समर्थ हैं अर्थात वे अनुभव करते हैं कि
このストーリーは、DASTAKTIMES の January 2025 版からのものです。
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प्रत्येक मानव के भीतर परमात्मा की अखण्ड सत्ता विद्यमान है और वही सारी शक्ति, आनन्द, ज्ञान और प्रेम का स्रोत है। भोजन से शक्ति, धन से सुख, पुस्तकों से ज्ञान और सम्बन्धियों से अपनत्व मानना ही इस सत्ता का निरादर एवं पाप है जिसका परिणाम रोग, वियोग, मलिनता और आवागमन है। श्रीमानस में दुःख को पाप का परिणाम कहा गया है।
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