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जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक

DASTAKTIMES

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March 2023

‘हिस्ट्री ऑफ कास्ट इन इंडिया' में डॉ. केतकर ने लिखा है, 'यह एक सामाजिक समूह होती हैं। इसकी सदस्यता संतति और इस प्रकार जन्मे लोगों तक ही सीमित रहती है। इसके सदस्यों पर कठोर सामाजिक नियमों के अधीन समाज के बाहर विवाह न करने पर पाबंदी रहती है।' यहां जाति का सबसे प्रमुख गुण है कि जाति समूह के बाहर विवाह करने पर पाबंदी रहती है।

- हृदयनारायण दीक्षित

जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक

जाति खासी चर्चा में है। डॉ. लोहिया और डॉ. आंबेडकर सहित अनेक चिंतकों ने भारत की जातीय संरचना को राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध बताया है। डॉ. लोहिया ने जाति तोड़ो का नारा भी दिया था। डॉ. आंबेडकर ने भी जाति के समूल नाश का ध्येय लेकर लगातार काम किया था। जाति खात्मा सभी महान नेताओं का स्वप्न रहा है, लेकिन जाति की अस्मिता बढ़ाने का गलत काम जारी है। जाति की कोई संवैधानिक परिभाषा नहीं है। बेशक भारत में सैकड़ों जातियां हैं, जाति का अस्तित्व है, जाति की राजनीति है। जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक रही हैं। मूलभूत प्रश्न है कि आखिर जातियां हैं क्या? फ्रांसीसी विद्वान सेनार्ट के अनुसार ये एक निकाय जैसी हैं। अनुवांशिकता से प्रतिबद्ध है। कतिपय उत्सवों के अवसर पर इनके लोग इकट्ठे होते हैं। समान धंधों व्यवसायों के कारण आपस में जुड़े रहते हैं। कुछ जातियों में परंपरागत जाति मनवाने के लिए जातिवाह्य घोषित करने की परंपरा भी रही है। भारत की वर्तमान जाति व्यवस्था में यह विवेचन लागू नहीं होता। एक विद्वान एच. मस्ले के अनुसार, 'जाति परिवारों का समूह होती हैं । प्रायः व्यवसाय विशेष की सूचक होती हैं। प्रत्येक जाति का एक पौराणिक पुरुष होता है। पौराणिक पुरुष अदृश्य देवता भी हो सकता है। जाति के सभी सदस्य स्वयं को उस पुरुष या देवता के प्रति निष्ठावान रखते हैं। जाति की यह परिभाषा भी भारतीय जाति व्यवस्था का पूरा अर्थ नहीं प्रकट करती।

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