कोशिश गोल्ड - मुक्त
लंकाकाण्ड : युद्ध का पहला दिन
Jyotish Sagar
|June 2025
गंगातट पर चल रही रामकथा के 25वें दिन 'लंकाकाण्ड' की कथा चल रही है, जिसमें दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ चुकी हैं और पहले दिन का युद्ध आरम्भ हो चुका है, जिसमें दोनों सेनाओं के बीच आरम्भिक मुठभेड़ हो चुकी है। अब आगे की कथा...
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"वानर सेना से मार खाकर राक्षस सेना जब भागकर लंका पहुँची, तो रावण बहुत क्रोधित हुआ और उसने अपने योद्धाओं से कहा कि जो युद्ध में पीठ दिखाकर भागेगा, उसे मृत्युदण्ड दिया जाएगा। रावण से डरकर सभी वापस युद्ध के लिए चल पड़े। सोचने लगे कि युद्धभूमि में मरना वीरों की शोभा है। अब उन्हें प्राणों का भय नहीं रहा और पूरे जोश के साथ वानर सेना पर टूट पड़े, जिससे रीछ, वानर सैनिक व्याकुल हो उठे और अपने-अपने सेनानायकों को पुकारने लगे। कोई कह रहा है, अंगद कहाँ है? तो कुछ कह रहे हैं हनुमान कहाँ हैं? कुछ कहते हैं नल-नील कहाँ हैं? जब हनुमान जी ने अपनी सेना को भयभीत होते हुए सुना, तो उन्हें बहुत क्रोध आया। उस समय वे पश्चिमी द्वार पर मेघनाद से युद्ध कर रहे थे। पश्चिमी द्वार टूट नहीं रहा था। उससे बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी।
अपने सैनिकों को भयभीत देखकर वे क्रोध में बड़े जोर से गरजे और कूदकर लंका के किले पर आ गए। उन्होंने एक पहाड़ लेकर मेघनाद के ऊपर छोड़ दिया, जिससे रथ टूट गया। उन्होंने सारथि को मार गिराया और मेघनाद की छाती में लात मारी। दूसरा सारथि मेघनाद को व्याकुल जानकर उसे रथ में डालकर तुरन्त घर ले गया।"
स्वामी जी ने कुछ दोहा और चौपाइयाँ अपने साथियों के साथ स्वर में वाद्ययन्त्रों की धुन पर गायीं-
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई॥ कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा।। नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती।। कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।। पुनि कर गहि कंचन के खंभा।
कहेन्हि करिअ उत्पात अरंभा॥ गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥
यह कहानी Jyotish Sagar के June 2025 संस्करण से ली गई है।
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