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श्रीगणेश नाम रहस्य
Jyotish Sagar
|September 2024
हिन्दुओं के पंच परमेश्वर में भगवान् गणेश का स्थान प्रथम माना जाता है। शंकराचार्य जी ने के भी पंचायतन पूजा में गणेश पूजन विधान का उल्लेख किया है। गणेश से तात्पर्य गण + ईश अर्थात् गणों का ईश से है। भगवान् गणेश को कई अन्य नामों से भी पूजा जाता है जैसे विघ्न विनाशक, विनायक, लम्बोदर, सिद्धि विनायक आदि।
अग्निपुराण में विनायक (गणेश) की आकृति मनुष्य के समान, लेकिन उदर विशाल बताया गया है। वेदों का सुप्रसिद्ध मन्त्र गणपति की स्तुति में—
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कविनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ।।
इसमें भगवान् गणेश को 'ब्रह्मणस्पति' कहा गया है, जिसका भावार्थ वाणी के स्वामी से है। ज्येष्ठराज शब्द का अर्थ सबसे प्रथम एवं देवताओं के राजाधिराज शासनकर्ता से है। इस सम्पूर्ण मन्त्र में श्रीगणेश की स्तुतिगान ही मिलता है। वैदिक ग्रन्थों में भगवान् श्रीगणेश को महाहस्ति, एकदन्त, वक्रतुण्ड आदि नामों से भी वर्णित किया गया है।
भगवान् श्रीगणेश के समस्त अंगों की संरचना समान नहीं है । मुखाकृति गजमुख, लेकिन कण्ठ के नीचे का भाग मानव का। श्रीगणेश की देह गज एवं नर का अनुपम सम्मिलन है। शास्त्रों एवं कथाओं में बताया जाता है कि श्रीगणेश का ऊर्ध्व गज के समान अर्थात् निरुपाधि ब्रह्मरूप है। गणपति के नामों में एक नामकरण मिलता है, एकदन्त । उनका दाहिना दन्त ही विद्यमान है।
यह कहानी Jyotish Sagar के September 2024 संस्करण से ली गई है।
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