कोशिश गोल्ड - मुक्त
दायित्व बोध का संकट
Jansatta
|December 31, 2025
हाल ही में लखनऊ में जिस तरह के दृश्य सामने आए, वह उस व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति का आईना है, जिसमें सार्वजनिक संपत्ति के प्रति हमारी जिम्मेदारी लगातार कमजोर पड़ती जा रही है।
एक कार्यक्रम के दौरान सजावट के लिए लगाए गए पौधों को जिस सहजता से तथाकथित सभ्य लोगों ने उठा लिया, उसने एक असहज सवाल खड़ा किया है कि विकास की भाषा धाराप्रवाह बोलने वाले हम लोग, क्या अपने नागरिक होने का अर्थ भूलते जा रहे हैं! यह घटना इसलिए भी विचलित करती है क्योंकि इसमें वे लोग शामिल नहीं थे, जिनके लिए मजबूरी या अभाव का तर्क दिया जा सके। गमले उठाने वाले वैसे लोग थे, जिन्हें समाज संपन्न, शिक्षित और 'सभ्य' मानता है। जब लाखों रुपए की गाड़ी रखने वाला व्यक्ति कुछ सौ रुपए का सरकारी गमला उठाकर ले जाता है, तो यह उस मानसिकता की अभिव्यक्ति होती है, जिसमें सार्वजनिक वस्तु को 'मुफ्त का माल' समझ लिया जाता है। यह आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक दरिद्रता का भी लक्षण है।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि शिक्षा, आय और आधुनिक जीवन-शैली अपने साथ अनुशासन और नैतिकता भी ले आती है, लेकिन ऐसी घटनाएं इस भ्रम को बार-बार तोड़ती हैं। सच यह है कि संपन्नता और संस्कार के बीच कोई स्वाभाविक रिश्ता नहीं है। कई बार सुविधा और ताकत का अहसास व्यक्ति को नियमों से ऊपर होने का भ्रम दे देता है। यही भ्रम सार्वजनिक जीवन को सबसे गहरी चोट पहुंचाता है, क्योंकि इससे नागरिक जिम्मेदारी आत्मसात होने के बजाय धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है।
यह कहानी Jansatta के December 31, 2025 संस्करण से ली गई है।
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