कोशिश गोल्ड - मुक्त
ई-कचरे से उपजे संकट का बढ़ता दायरा
Jansatta Kolkata
|November 17, 2025
अमेरिका से लाखों टन बेकार हो चुकी इलेक्ट्रानिक सामग्री कई देशों में ठिकाने लगाने के लिए भेजी जाती है। इनमें से अधिकांश दक्षिण पूर्व एशिया के विकासशील देश हैं। इन देशों में इस खतरनाक कचरे को सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
पर्यावरण पर वैश्विक निगरानी रखने वाली संस्था 'बासेल एक्शन नेटवर्क' (बीएएन) की ताजा रपट में जानकारी दी गई है कि अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रानिक सामग्री कई देशों में ठिकाने लगाने के लिए भेजी जा रही है। इनमें से अधिकांश दक्षिण पूर्व एशिया के विकासशील देश हैं। इन देशों में इस खतरनाक कचरे को सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं।
बावजूद इसके अमेरिका की दस बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस्तेमाल की अवधि समाप्त हो चुके इलेक्ट्रानिक्स सामानों को एशिया और पश्चिमी एशिया के गरीब देशों में ठिकाने लगा रही हैं। इस ई-कचरे से कई चुनौतियां पैदा होने वाली हैं।
बीएएन की रपट के अनुसार यह ई-कचरे की अदृश्य सुनामी है, क्योंकि विकासशील और गरीब देश इस कचरे का पुनर्चक्रण करने में समर्थ नहीं हैं। फिर भी कुछ ताकतवर देश इन देशों को अपने कचरे का ठिकाना बनाने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। लिहाजा अब पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाली संस्थाओं को यह आकलन करना कठिन हो रहा है कि घातक कचरा जिन देशों में फेंका जा रहा है, वहां का वायुमंडल किस हद तक प्रभावित और प्रदूषित होगा। इसका वहां के लोगों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ेगा, यह अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है। इस कचरे में कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और दूसरे उपकरण शामिल हैं। इनमें सीसा, कैडमियम और पारा जैसी सामग्रियां हैं, जो मूल्यवान होने के साथ विषाक्त हैं। जैसे-जैसे तकनीकी उपकरण नई विशेषताओं के साथ तेजी से बदले जा रहे हैं, वैसे-वैसे पुनर्चक्रित नहीं किए जाने वाला कचरा पांच गुना बढ़ता जा रहा है।
यह कहानी Jansatta Kolkata के November 17, 2025 संस्करण से ली गई है।
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