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जीएसटी सुधार ऐतिहासिक लेकिन अब भी अधूरा
Business Standard - Hindi
|September 17, 2025
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की इस बात को लेकर सराहना होनी चाहिए कि इसने जीएसटी दरों की संख्या को कम करके और बदलाव लाकर 'यथास्थिति बनाए रखने की जड़ता' खत्म की है।
प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद से ही लोगों को कर की दरें कम होने, एक सरल संरचना और कर भुगतान में आसानी की उम्मीद बढ़ गई थी क्योंकि उन्होंने दीवाली के तोहफे के तौर पर, कर बोझ कम करने का वादा किया था। जीएसटी परिषद के अध्यक्ष के रूप में इसका श्रेय केंद्रीय वित्त मंत्री को जाता है कि उन्होंने सदस्यों को सर्वसम्मति से इस फैसले को स्वीकार के लिए राजी किया। इस फैसले के तहत, अधिकांश वस्तुओं को 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी स्लैब में ले जाया गया। साथ ही, पंजीकरण की रफ्तार बढ़ाने और रिफंड जल्दी सुनिश्चित करने के उपाय भी किए गए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुभवों को देखा जाए तो यह अंदाजा होता है कि मूल्यवर्धित कर (वैट) के लिए सभी के लिए मुफीद होने वाली एकसमान व्यवस्था नहीं है। हर देश राजनीतिक स्वीकार्यता और सुविधा के आधार पर वैट का एक अलग रूप अपनाता है। हालांकि, यदि इसमें कुछ खराब पहलू जैसे कि बड़े पैमाने पर छूट, बहुत अधिक या कम सीमाएं, या कई दरें शामिल हो जाती हैं तो बाद में इन्हें हटाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
लेकिन, अगर कर का बोझ कम करने के लिए इसमें बदलाव किया जाता है तो उसे सभी का समर्थन मिलता है। इसलिए, दरों की संख्या कम करने के फैसले का सभी ने स्वागत किया है। गैर-राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) शासित राज्यों को राजस्व घाटे की आशंका थी लेकिन वित्त मंत्री ने उनके डर को दूर कर दिया है। वैसे भी, ये राज्य खुद को इस प्रक्रिया में बाधा डालने वालों की तरह नहीं दिखना चाहते थे।
आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, इस सुधार से इस वित्त वर्ष में लगभग 48,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा होने की उम्मीद है। यह प्रतिमाह लगभग 8,000 करोड़ रुपये होगा जो बहुत अधिक नहीं है। यह आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि जिन वस्तुओं पर अब 5 फीसदी कर लगेगा, उनकी खपत कुछ हद तक बढ़ने की संभावना है जिससे इस नुकसान की भरपाई होगी क्योंकि इस श्रेणी की अधिकांश वस्तुओं की खपत में कीमत का बहुत असर होता है।
यह कहानी Business Standard - Hindi के September 17, 2025 संस्करण से ली गई है।
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