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शहरी चुनौती कोष को मजबूत ढांचे की जरूरत
Business Standard - Hindi
|September 02, 2025
भारत के शहर संभावनाओं से भरपूर हैं मगर धन जुटाने के पुराने तौर-तरीकों और अत्यधिक दबाव का सामना कर रहे बुनियादी ढांचे के कारण अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रगति नहीं कर पा रहे हैं।
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वर्ष 2011 और 2018 के बीच शहरी उपयोगिता ढांचे (रियल एस्टेट को छोड़कर) पर पूंजीगत व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल औसतन 0.6 फीसदी रहा है। यह जरूरी रकम का महज एक चौथाई हिस्सा ही है। वर्ष 1992 में भारतीय संविधान में हुए 74 वें संशोधन का लक्ष्य शहरों को 'अपना भविष्य स्वयं तय करने की स्वतंत्रता' देना था मगर यह उद्देश्य अधूरा रह गया है।
इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इस साल फरवरी में प्रस्तुत केंद्रीय बजट में एक बड़े बदलाव की घोषणा की गई जिसकी जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि केंद्र सरकार 'शहरों को विकास के केंद्र बनाने', 'शहरों के रचनात्मक पुनर्विकास' और 'जल एवं स्वच्छता' जैसे प्रस्ताव लागू करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के साथ शहरी चुनौती कोष (अर्बन चैलेंज फंड या यूएसीएफ) तैयार करेगी। यह 'अधिकार आधारित' अनुदानों से 'प्रदर्शन आधारित' वित्त पोषण तंत्र की तरफ उठाया गया एक बड़ा रणनीतिक कदम है।
भारत की जनगणना किसी इलाके को दो शर्तों पर शहरी क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करती है। पहली शर्त, अगर कोई अधिसूचित शहरी स्थानीय निकाय वाला एक वैधानिक शहर है, तो वह शहरी क्षेत्र में आएगा। दूसरी शर्त, कोई क्षेत्र जनगणना शहर हो जो सभी तीन मानदंडों को पूरा करता हो यानी वहां कम से कम 5,000 आबादी हो, प्रति वर्ग किलोमीटर 400 जनसंख्या घनत्व हो और 75 फीसदी पुरुष कार्य बल गैर-कृषि गतिविधियों में शामिल हो। वर्ष 2027 की जनगणना में इन मानदंडों को लागू करने से ऐसा हो सकता है कि भारत के शहरी क्षेत्रों में 60 फीसदी से अधिक आबादी रहने लगे।
यह कहानी Business Standard - Hindi के September 02, 2025 संस्करण से ली गई है।
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