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विकसित भारत आंदोलन का आधार बने एनईपी 2020
Aaj Samaaj
|July 06, 2025
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार, भारत 17वीं सदी तक विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 35 प्रतिशत तक का योगदान देता था। इस उपलब्धि के मूल में कोई संयोग नहीं, बल्कि भारत की दूरदर्शी और व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था थी। प्राचीन भारत में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, ओदंतपुरी जैसे विश्वविद्यालयों में खगोलशास्त्र, गणित, वास्तुकला, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र, राजनीति, संगीत, भाषा विज्ञान जैसे विषय एक ही छत के नीचे पढ़ाए जाते थे। यह बहुविषयक प्रणाली केवल ज्ञान नहीं देती थी, बल्कि जीवन जीने की कला, नेतृत्व और नैतिकता का दर्शन भी कराती थी।
एक समय था जब भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति हुआ करता था। यह देश ज्ञान, विज्ञान और समृद्धि का प्रतीक रहा है। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार, भारत 17वीं सदी तक विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 35 प्रतिशत तक का योगदान देता था। इस उपलब्धि के मूल में कोई संयोग नहीं, बल्कि भारत की दूरदर्शी और व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था थी। प्राचीन भारत में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, ओदंतपुरी जैसे विश्वविद्यालयों में खगोलशास्त्र, गणित, वास्तुकला, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र, राजनीति, संगीत, भाषा विज्ञान जैसे विषय एक ही छत के नीचे पढ़ाए जाते थे। यह बहुविषयक प्रणाली केवल ज्ञान नहीं देती थी, बल्कि जीवन जीने की कला, नेतृत्व और नैतिकता का दर्शन भी कराती थी। शिक्षा में गुरु-शिष्य परंपरा और अनुभवजन्य अधिगम की भूमिका सर्वोपरि थी। 19वीं सदी में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लॉर्ड मैकॉले ने कहा था - "मैं एक ऐसा वर्ग बनाना चाहता हूं जो रंग-रूप से भारतीय हो, लेकिन सोच और समझ से अंग्रेज हो।" इसी सोच के तहत ऐसी शिक्षा प्रणाली लाई गई जिसका उद्देश्य था केवल क्लर्क और सरकारी बाबू तैयार करना। विषयों को टुकड़ों में बांट दिया गया और विद्यार्थियों को विश्लेषण की क्षमता से वंचित कर दिया गया। आज भी हम इसकी छाया अपने विश्वविद्यालयों की ढांचागत सीमाओं और एकांगी शिक्षा में देख सकते हैं। जब देश 'विकसित भारत @2047' की ओर अग्रसर है, तब हमारी शिक्षा नीति को भी समय के अनुरूप नया आकार देना अनिवार्य और स्वाभाविक हो गया। राष्ट्रीय शिक्ष
यह कहानी Aaj Samaaj के July 06, 2025 संस्करण से ली गई है।
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