कोशिश गोल्ड - मुक्त

चिकोटी काटा, बकोटा नहीं

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December 2025

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार व कई अख़बारों के संपादक रहे नवीन जोशी पर आई नई किताब 'नवीन धुन' इन दिनों चर्चा में है। इस किताब में सत्तर के दशक से लेकर नई सदी के शुरुआती सालों की पत्रकारिता की एक धुन सुनाई देती है। ऐसी धुन जो मौजूदा दौर के पत्रकारों और पत्रकारिता की ट्रेनिंग ले रहे छात्रों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं। प्रस्तुत है इस नई पुस्तक के कुछ अंश।

चिकोटी काटा, बकोटा नहीं

सीखने और सिखाने की उस जादुई प्रक्रिया में जहां सवाल पूछना मना नहीं बल्कि जरूरी होता है, वहीं से शुरू होती है हमारे नवीन सर की दुनिया। जहां सीनियर से बहस करना गुस्ताखी नहीं, आइडिया को और रिफाइन कर देने वाला है। जहां जूनियर की बात को सुनना वक्त की बर्बादी नहीं, भविष्य की बुनियाद है। असल में, यही कला उन्हें 'नवीन सर' बनाती है। पर जो सवाल अक्सर साथ काम करने वालों के मन में खलबलाते रहे, वो आज भी अनुत्तरित हैं।

मन में सवाल है कि क्या उनकी ज़िंदगी में भी कभी कोई 'नवीन जोशी' आया होगा? एक ऐसा संपादक जिसने उन्हें सुना होगा? जिन्होंने उनकी उलझनों को समझा होगा? क्या उन्हें भी कभी किसी ने वो स्पेस दिया होगा जिसमें वो खुद को तलाश सकें? या फिर उन्होंने अपने अनुभवों से ही सीखा... कि कैसा होना चाहिए एक पत्रकार/संपादक? संवेदनशील, सजग, सदा उत्सुक और बच्चों जैसी जिज्ञासा समेटे हुए? सैंतालिस बरस पहले कौन-सा क्षण रहा होगा जब उन्होंने पहली बार पत्रकारिता का दामन थामा होगा?

पत्रकार तो कभी बनना ही नहीं चाहा

शायद यह बात आपको मायूस करे कि नवीन जोशी कभी पत्रकार बनना ही नहीं चाहते थे। वह तो पहाड़ पर जाकर मास्टरी करना चाहते थे। उनकी नजर में वह मास्टर बनकर ही कुछ बदलाव, कुछ सुधार कर सकते थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं कि पत्रकारिता की जाए या ऐसा कुछ किया जाए। विचारों में विद्रोह के कुछ रेशे, कुछ बदलाव लाने की चाह थी लेकिन जहां तक सोच जाती थी वहां पर मास्टर बनना ही सबसे मुफीद लगा।

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