कोशिश गोल्ड - मुक्त
कहीं आप तो नहीं हो रहे इस डिसऑर्डर के शिकार
Sadhana Path
|June 2025
किसी अपने की मौत का दुःख सभी को होता है लेकिन कुछ लोग इस सदमें से कभी बाहर नहीं निकल पाते हैं। लंबे समय तक इस तरह एक घटना को लेकर सोचना कोई सामान्य बात नहीं है। यह एक खास तरह का अवसाद है, जिसे प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर कहते हैं।
पिछले कुछ समय से हम सभी एक अजीब दौर से गुजर रहे थे। जहां एक तरफ बेरोजगारी इंसान को हैरान-परेशान किए हुए थी तो दूसरी तरफ अपनों मौत उसे दुःखी कर रहा था। धीरे-धीरे स्थिति बेहतर होने लगी है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनों के जाने को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। किसी का पति चला गया तो किसी का बेटा ! किसी की मां चल बसी तो किसी की बेटी। हर वो परिवार जिसका कोई अपना चला गया है, वो एक अथाह दुःख में जी रहा है। लंबे समय तक इस सदमे में रहने की वजह से वह एक अवसाद में घिर गया है। दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक इसे एक खास तरह का डिप्रेशन बता रहे हैं। इसे प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर बताया जा रहा है।
विदेशों में इसे लेकर कई तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं। यहां तक कि लोगों से मुखर होकर इस पर बात करने की अपील कर रहे हैं। खासकर, कोविड के बाद
क्या है प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर ?
मनोवैज्ञानिक डॉ. स्वाति सिंह का कहना है कि प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर एक ऐसा दुःख या कहें कि शोक है जिसकी गिरफ्त में इंसान लंबे समय तक रहता है। कई बार तो इंसान इस दुःख से निकल ही नहीं पाता। मतलब इस बीमारी के मरीज सालों तक किसी दुःख के साये में रहते हैं और मरीज सालों तक किसी दुर्घटना का शोक मनाते रहते हैं।
चिकित्सा जगत के लिए चुनौती
मनोवैज्ञानिक डॉ. स्वाति सिंह का मानना है कि ये वर्तमान में ही चर्चा में आया है। इस पर कई सालों से शोध किया जा रहा है। यह बीमारी चिकित्सा जगत के लिए भी एक चुनौती है। आप इसे ऐसे समझिए कि किसी परिचित की मौत होती है तो उस पर रोना एक सामान्य व्यवहार है। फिर समय के साथ व्यक्ति इससे उबर आता है। दिक्कत तब शुरू होती है जब सालों बाद भी वह उसी घटना के बारे में सोचता रहता है।
यह कहानी Sadhana Path के June 2025 संस्करण से ली गई है।
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