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ऐसी दिवाली मनाओ कि आपकी सदा दिवाली हो जाय
Rishi Prasad Hindi
|September 2025
१८ से २३ अक्टूबर तक दीपावली पर्व है।
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इसके लौकिक व आध्यात्मिक महत्त्व के बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग-वचनामृत में आता है:
सामाजिक दृष्टि से देखा जाय तो व्यापारी दिवाली के दिन हिसाब-किताब मिलान करते हैं, सँवारते-सुलझाते हैं । धनतेरस की संध्या को लक्ष्मी-पूजन करते हैं। महारात्रियों के दिनों में मंत्रजप करने से शीघ्र सफलता होती है।
शारीरिक दृष्टि से देखा जाय तो दिवाली के दिनों में सर्दियाँ प्रारम्भ होती हैं। पित्त व वायु दोष को निवृत्त करने के लिए शरीर को मिष्टान्न की आवश्यकता है इसलिए ऐसे पदार्थ इस पर्व पर खाने-खिलाने की परम्परा है। शरीर को मजबूत करने का संकेत देनेवाला यह पर्व है।
दिवाली कब से शुरू हुई ? बोले : 'भगवान श्रीराम रावण-वध के बाद अयोध्या में आये तो लोगों ने घर-मकानों की, अड़ोस-पड़ोस की, गली-कूचों की साफ-सफाई की, दीप प्रकटाये, मीठा मुँह किया और अभिवादन किया तब से शुरू हुई। लाखों वर्ष हो गये श्रीरामजी को धरती पर प्रकट हुए।' दिवाली कब शुरू हुई इस विषय में अन्य भिन्न-भिन्न मत भी प्रचलित हैं।
पंच पर्वों का पुंज
दिवाली ५ पर्वों का झुमका है - धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, बलि प्रतिपदा, भाईदूज ।
धनतेरस : धनतेरस के दिन सुबह उठकर भगवान नारायण का चिंतन करो और संकल्प करो कि 'आज हम महालक्ष्मी की आराधना करेंगे।'
संध्याकाल में लक्ष्मीजी की प्रतिमा या लक्ष्मीजी के सिक्के का पूजन किया जाता है, लोग पंचामृत से स्नान कराते हैं और प्रार्थना करते हैं कि 'हे माँ महालक्ष्मी ! जिस पर तू प्रसन्न होती है उसको तू सन्मति देकर सत्यस्वरूप नारायण का दर्शन करा सकती है। हे माँ ! हमारे घर में तुम निवास तो करो पर नारायण की कृपासहित ।'
जो साधक नारायण-रस में डूबता है परम पवित्र महालक्ष्मी उसके इर्द-गिर्द मँडराती है, वह साधक सिद्ध हो जाता है। फिर उसकी चरणरज भी लोगों का भाग्य बदलने का काम कर देगी । यह साधक की दृष्टि की दिवाली है। बाहर की दिवाली तो हर १२ महीने में मनायी जाती है परंतु साधक की दिवाली हर रोज मनायी जा सकती है।
Cette histoire est tirée de l'édition September 2025 de Rishi Prasad Hindi.
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