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गुरुदेव सिखाते कर्म में सजगता व कुशलता का पाठ
Rishi Prasad Hindi
|April 2025
शास्त्र कहते हैं:योगःकर्मसु कौशलम्।
-
कर्मों में कुशलता ही योग है। कुशलता क्या है ? कर्मों में निष्कामता और हृदय में समता ही कुशलता है। जो कर्म स्वभाव से ही बाँधनेवाले हैं वे ही मुक्ति देनेवाले हो जायें यही वास्तव में कर्मों में कुशलता है । यदि कर्म ईश्वरप्रीत्यर्थ, तत्परता व दक्षता पूर्वक किये जायें तो वे मुक्तिफल की प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं किंतु यदि कर्ता सावधान नहीं रहा तो सेवा के बदले सुविधा, मान की चाह, आलस्य, प्रमाद, लापरवाही आदि दोष उसके मुक्ति-पथ में बाधक बन जाते हैं। इसलिए ब्रह्मवेत्ता संत पूज्य बापूजी सभीको यही सिखाते रहे हैं कि हम कर्म करें तो ऐसी कर्तव्यनिष्ठा, कुशलता व सजगता से करें कि हमारे वे कर्म पूजा बन जायें। अहमदाबाद आश्रम में सेवारत धवलेश्वर खुंटिआ, जिन्हें वर्ष १९९५ से पूज्य बापूजी के सत्संग-सान्निध्य का लाभ मिलता रहा है, वे गुरु-सान्निध्य के कुछ ऐसे ही संस्मरणों को साझा करते हुए बताते हैं :
इतनी बारीक बात को कुछ ही क्षणों में भाँप लिया !
१९९५ की बात है । पूज्य बापूजी सूरत आश्रम में ठहरे थे । एक दिन गुरुदेव खेत के आसपास टहल रहे थे । मैं गन्ने के खेत में पानी पिला रहा था । थोड़ी देर में एक भाई मेरे पास आये और बोले : “बापूजी आपको बुला रहे हैं।”
मैं पानी बंद करके उनके साथ गया । मैंने श्रीचरणों में प्रणाम किया तो गुरुदेव बोले :“गन्ने के खेत में इतना सारा पानी भरा है, तूने पानी पिलाया है उसमें ?”
गन्ने के खेत में कुछ ऐसी क्यारियाँ थीं जिनके अंत में न जाने कैसे पानी जमा हो रहा था । मैं समझ गया कि गुरुदेव उन्हींकी बात कर रहे हैं। मैंने कहा : “जी, मैंने ही पिलाया है।”
Cette histoire est tirée de l'édition April 2025 de Rishi Prasad Hindi.
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