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सावित्री उपासना से विजय और कीर्ति प्राप्ति साधना विधान

Jyotish Sagar

|

November 2025

सावित्री धनुर्वेद का महान् अंग हैं।

- • डॉ. अमित कुमार 'राम'

सावित्री उपासना से विजय और कीर्ति प्राप्ति साधना विधान

प्राचीन काल में बहुत से धनुर्धरों ने सावित्री की उपासना करके विजय और कीर्ति प्राप्त की थी। किसी ने ब्रह्मास्त्र सिद्ध किया, तो किसी ने पाशुपतास्त्र प्राप्त किया। ब्रह्मदण्ड और ब्रह्मशिरस जैसे अमोघ अस्त्रों के लिए बहुतेरे ब्राह्मणों ने तपश्चर्या की है और उन्हें सिद्ध किया है। देवी भागवत पुराण में तो पूर्णरूपेण गायत्री का गुणगान किया है। 25 अध्याय जैसा विस्तारमय विवेचन यदि किसी महामन्त्र के ऊपर हुआ है, तो वह है गायत्री माहात्म्य की प्रतिष्ठा पर ही।

ब्रह्मास्त्र से बड़े-बड़े नरकेसरि काँप उठते थे। बड़े-बड़ों के छक्के छूट जाते थे। अनेक योद्धा इसका नाम सुनकर व्याकुल हो जाते थे। ब्रह्मास्त्र की ऐसी भीषणता थी कि इस अमोघ शक्ति के सामने सर्वनाश उपस्थित हो जाता था। इसकी प्रचण्ड शक्ति से आबाल वृद्ध तो भस्म हो ही जाते थे, गर्भ में स्थित बालक भी सुरक्षित नहीं रह सकते थे। ब्रह्मास्त्र यानी प्रलय की मूर्ति। मन्त्र के बल से अनेक अमोघ अस्त्र सिद्ध होते थे। वायव्यास्त्र और आग्नेयास्त्र का नाम किसने नहीं सुना है? मन्त्र शक्ति ऐसी महाशक्ति है, जिसकी उपासना किसी भी साधक ने की हो, उसने शत्रुओं पर अवश्य ही विजय प्राप्त की है।

सावित्री से ब्रह्मास्त्र सिद्ध करना इस प्रकार होता है—सावित्री के सामर्थ्य को शस्त्रों में उतारने के लिए किसी विशेष विधि से विशेष क्रम में जप करना पड़ता है। ब्रह्मास्त्र के लिए सावित्री को विलोम क्रम में उल्टा जपना होता है।

ॐ दयादचोप्र नो यो योधि हिमधी स्यवदेर्गो भण्र्ण्यरेर्वतुविस तद् स्वोवर्भुभूरोम्।।

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