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शक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा
Jyotish Sagar
|April 2025
जिस प्रकार परम तत्व विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि रूप में भिन्न होकर भी अभिन्न है, उसी प्रकार त्रिपुरसुन्दरी पराशक्ति के रमा, दुर्गा, सीता, राधा रूप भी नित्य एवं शाश्वत हैं तथा भिन्न होकर भी अभिन्न हैं।
शक्तिस्वरूपा माता दुर्गा की आराधना की परम्परा हमारे देश भारत में ही नहीं वरन् विश्व के कई देशों में आदिकाल से चली आ रही है। ऊर्जा एवं चेतना शक्ति के ही पर्याय है।
जनश्रुतियों में शक्तिमान् स्वरूप अद्वय तत्त्व का प्रतिपादन किया है। वहीं एक तत्त्व परम पुरुष और पराशक्ति स्वरूपा से द्विविध है। वे परम पुरुष परमात्मा जगत् की दृष्टि, स्थिति एवं संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश स्वरूप होते हैं, तो उनकी शक्ति भी इन रूपों के साथ सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती हैं।
जिस प्रकार परम तत्त्व विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि रूप में भिन्न होकर भी अभिन्न है, उसी प्रकार त्रिपुरसुन्दरी पराशक्ति के रमा, दुर्गा, सीता, राधा रूप भी नित्य एवं शाश्वत हैं तथा भिन्न होकर भी अभिन्न हैं। आद्याशक्ति की नैष्ठिक उपासना करने वाले शाक्त सम्प्रदाय में भी शक्ति के विविध रूप हैं।
महालक्ष्मी, महासरस्वती, गौरी, उमा, महाकाली, दुर्गा, शाकम्भरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, बगलामुखी, कात्यायिनी, मातंगी, कामरूपा, सिद्धिदात्री आदि रूपों में शक्ति की आराधना प्राचीन काल से चली आ रही है। मधु, कैटभ, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड, दुर्ग आदि दैत्यों का संहार करने वाली देवी दुर्गा की पवित्र गाथा मार्कण्डेय पुराण के 81वें से 94वें अध्याय में है, जो दुर्गासप्तशती के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें लगभग 700 श्लोक हैं। देवी भक्त इस धार्मिक ग्रन्थ का नवरात्र के दिनों में पारायण (स्वाध्याय) करते हैं। दुर्गा नाम के पीछे भी दो कारण हैं। 'दुर्ग' दैत्य का नाश करने के लिए देवी का नाम ‘दुर्गा’ हुआ।
अन्य कारण यह है कि आद्याशक्ति की उपासना करने से व्यक्ति दुर्ग के समान आध्यात्मिक रूप से दृढ़चित्त हो जाता है। उसमें अपूर्व जीवनदायिनी शक्ति का प्रार्दुभाव होता है। प्रकृति का अतीव मनोहारी स्वरूप मन की विराटता में समाविष्ट हो जाता है। पुरुष (ब्रह्म) की सहचरी ही प्रकृति (माया) है। प्रकृति एवं पुरुष के सामीप्य से ही अखिल ब्रह्माण्ड में सृष्टि का संचालन होता है। चैत्र मास में आने वाले नवरात्र 'बासन्तिक नवरात्र' के नाम से जाने जाते हैं।
Cette histoire est tirée de l'édition April 2025 de Jyotish Sagar.
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