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जयप्रकाश से प्रकाशनाथ तक का सफर!

Jyotish Sagar

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April 2025

मीन राशि में केतु जब गुरु से द्रष्ट होता है, तब वह जातक को कष्ट प्रदान करके जीवन से विरक्त करते हुए मोक्ष अथवा संन्यास की ओर मोड़ देता है। ऐसा जातक धर्मात्मा साधु होता है।

- डॉ. अमित कुमार 'राम'

जयप्रकाश से प्रकाशनाथ तक का सफर!

पृथ्वीलोक को मृत्युलोक भी कहा गया है। यह कर्मलोक भी है, क्योंकि यहाँ जन्म लेने वाला प्रत्येक जीव-जन्तु कर्म किए बगैर रह ही नहीं सकता। मनुष्य भी कर्म करता है और कर्म चाहे अच्छा हो अथवा बुरा, कर्म तो होगा ही। फिर उस अच्छे या बुरे कर्म का मन्थन होगा और उस मन्थन से कर्मफल प्राप्त होगा, क्योंकि जब हम कर्म किए बगैर रह ही नहीं सके, तो फल भी प्राप्त होने से नहीं रोक सकते और जब कर्मफल प्राप्त होगा, तो उस फल का भोग करने के लिए फिर एक जन्म, एक शीर्षक, एक उपाधि लेनी ही होगी। इसलिए दर्शनशास्त्र बार-बार यही सिखाता है, उपनिषदों में वर्णित कहानियाँ यही बताती हैं कि कर्म का सन्तुलन बनाकर कर्म करें। इन्द्रियों के सुख के लिए कर्म नहीं करें, क्योंकि कर्म हुआ है, तो कर्मफल भी मिलेगा और कर्मफल भी मिलेगा, तो उस फल को भोगना भी स्वयं ही पड़ेगा और जब भोगना पड़ेगा, तो उसके लिए फिर एक भाग्य, एक विधान विधि द्वारा निर्मित किया जाएगा। उसी के अनुरूप जन्म होगा। जब जन्म उसी के अनुरूप होगा, तो उसे भोगना तो होगा ही।

ज्योतिषियों के पास लोग अधिकतर इसलिए जाते हैं कि अशुभ कर्म फल मिल रहा है, तो उसे रोककर शुभ फल प्राप्त किया जा सके, लेकिन क्या कभी सोचा है कि जो मिल रहा है, वह फल तो हमारा ही है। हमने इसे प्राप्त किया है। हमने ऐसे कर्म किए, तब जाकर यह कर्मफल सिद्ध हुआ है, लेकिन यदि अशुभ अथवा संघर्षयुक्त कर्मफल मिला, तो हम उसे बदलने के लिए दौड़ पड़ते हैं, मन्दिरों में जाते हैं, ज्योतिषियों के पास जाते हैं, तान्त्रिकों के पास जाते हैं, लेकिन दर्शनशास्त्र और वेदों के चक्षु कहे जाने वाले ज्योतिषशास्त्र में भी मनुष्य को कर्मफल भोगने के लिए प्रेरित किया गया है। यानी जो जान लिया गया है कि हमारा ही कर्मफल है, उसे स्वीकार करते हुए मन में आत्मविश्वास जगा, उस ईश्वर की शरण का स्मरण करते हुए कर्म फल भोगा जाए। ये भी मान लिया जाए कि जब कर्म किया, तो किसने किया था और जब कर्मफल मिल रहा है, तो किसके कर्मों का फल है?

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