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यह भी कोई कहानी है
Dainik Jagran
|October 26, 2025
कई बार लोगों को यह लगने लगता है कि यदि वे रिश्तों के बंधन में बंधे तो वह उनके पांव की बेड़ी बन जाएगा, मगर कई बार रिश्ते बेड़ी नहीं बल्कि उड़ान भी देते हैं। रिश्तों की ऐसी ही छवि प्रस्तुत करती गोविंद माल्ही की सिंधी भाषा की कहानी का अनूदित अंश ...
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मो हन ने मुझे अपने घर चलने और वहां रात को ठहरने के लिए आग्रह किया और मैं फौरन रजामंद हो गया। कोई समय था, कि हम दोनों का उठना-बैठना, खाना- पीना, घूमना-फिरना और लिखना-पढ़ना साथ ही होता था। वह न सिर्फ उम्र में मेरे बराबर था, बल्कि मेरा पड़ोसी भी था। पहली कक्षा से मैट्रिक तक हम दोनों एक साथ पढ़े थे। मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैं कराची जाकर कालेज की दुनिया में दाखिल हुआ। उसका पिता मध्यम वर्ग का अवश्य था, पर उसमें कालेज का गरदन-तोड़ खर्चा भरने की ताकत न थी। मोहन कुछ समय बेरोजगार रहने के बाद पी.डब्ल्यू.डी. विभाग में मुलाजिम हो गया। हम एक बार एक-दूसरे से अलग हुए तो न मिलनेवाली अलग राहों पर आगे बढ़ते गए। वर्षों बाद जब हम आपस में मिले, तो सिंध में नहीं, परंतु अहमदाबाद के गांधी चौक में। हमारे इस लंबे वियोग वाले समय में दुनिया ने न जाने कितनी करवटें बदली थीं। वह अपने विभाग की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर रोड्स डिवीजन में हेड क्लर्क बन गया था ... और मैं ... मैं तो साहित्य और समाज सेवा के चक्कर में फंसकर न घर का रहा और ना घाट का। मोहन का घर मणि नगर में था। उसने मेरे साथ बस में बैठते हुए पूछा, 'तुमने शादी की है?' मैंने हंसकर उत्तर दिया, 'मैं जिंदगी में स्वयं को अब तक व्यवस्थित नहीं समझता। किसी अन्य जायी से विवाह कर उसे भटकाना मुझे पसंद नहीं।'
वह आश्चर्यचकित होकर कुछ और पूछे, इससे पहले मैंने उससे सवाल पूछा, 'तुमने तो जरूर शादी की होगी?'
उसके चेहरे पर आश्चर्य की जगह खुशी की झलक दिखाई दी। उसने खुश होते हुए कहा, 'मेरी एक बेटी भी है।
रेखा भी अब पांच-छह साल की हो गई है।' इतना कहने के बाद वह मुस्कुरा रहा था।
'मैं तुम्हें शादी का निमंत्रण भेजता, पर सिंध से निकलने के बाद यह जानना जरा कठिन हो गया था कि कौन कहां रहता है?' फिर उसने जरा गंभीर होकर कहा, 'तुम आते थोड़े ही!'
मैंने आश्चर्य से पूछा, 'यानी?' 'तुम्हें लिखने और भाषण करने से फुर्सत कहां मिलती है?'
Cette histoire est tirée de l'édition October 26, 2025 de Dainik Jagran.
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