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हर गांव तक बस, चमकते बस अड्डों और ई-बसों के साथ नए जमाने से कदमताल

Business Standard - Hindi

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December 30, 2025

प्रदूषण और लागत घटाने के लिए इलेक्ट्रिक बसें, 1 लाख से ऊपर गांवों को बसों से जोड़ने, यात्रियों को आराम तथा सुविधाएं देने से प्रदेश का परिवहन तंत्र अलग मुकाम पर पहुंचेगा और राजस्व भी बढ़ेगा

- सिद्धार्थ कलहंस

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन की तस्वीर बदल रही है। एक ओर गांवों को शहर से जोड़ने के लिए बसें चलाने के प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं बड़े शहरों में मौजूद बस अड्डों को मॉल की तरह चमाचम और अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। प्रदूषण में कमी लाने के लिए हरित परिवहन को बढ़ावा देते हुए हर जिले में इलेक्ट्रिक बसें चलाने की तैयारी हो रही है।

यात्रियों को बेहतर यात्रा का अनुभव हो। उनका कहना है कि अगर सभी बसें इलेक्ट्रिक हो जाएं तो प्रदूषण में लगभग 38% तक कमी लाई जा सकती है, जो पूरे प्रदेश के लिए बहुत बड़ा बदलाव होगा।

मंत्री दयाशंकर सिंह ने बताया कि पहले परिवहन निगम अपनी पुरानी बसों को कबाड़ समझकर बेच देता था, लेकिन अब सरकार ऐसा नहीं करती है। अब पुरानी बसों को फेंकने के बजाय इन्हें इलेक्ट्रिक बसों में बदला जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक नई इलेक्ट्रिक बस बनाने में 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक लागत आती है, जबकि पुरानी बस को ईवी में बदलने में सिर्फ 60-70 लाख रुपये खर्च होते हैं। इससे सरकार का पैसा भी बचेगा और पुरानी बसें दोबारा नई बनकर सड़कों पर दौड़ेंगी और यात्रियों को अच्छी सुविधा देंगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों को आज की सबसे अहम जरूरत बताते हुए मंत्री दयाशंकर सिंह ने कहा कि शुरुआत में उत्तर प्रदेश के पास सिर्फ 1500 ई-बसें थीं और वे केवल शहरों में चलती थीं। अभी तक केवल 15 शहरों से ही इलेक्ट्रिक बसों का संचालन हो रहा था, लेकिन अब सरकार ने इन्हें बढ़ाकर 43 जिलों और कई ग्रामीण इलाकों तक पहुंचा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार नई इलेक्ट्रिक बसों के लिए निविदाएं निकाल रही है, लेकिन मुश्किल यह है कि पूरे देश में बहुत कम कंपनियां ई-बसें बनाती हैं। इसी वजह से इन बसों की आपूर्ति समय पर नहीं हो पाती। मंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि पिछले एक साल में 5000 ई-बसों की निविदा जारी हुईं, लेकिन कंपनियां सभी बसें उपलब्ध नहीं करा पाईं, क्योंकि उनके पास उतनी संख्या में बसें बनाने की क्षमता नहीं है।

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