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बेवफा कौन सोनम या समाज

Sarita

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July Second 2025

सोनम रघुवंशी जैसियों को ले कर इन दिनों पुरुष खेमा काफी बेचैन है.

बेवफा कौन सोनम या समाज

सोशल मीडिया पर ‘सोनम बेवफा है' ट्रेंड चल रहा है. मर्दों को अब शादी के साइड इफैक्ट्स नजर आने लगे हैं. कहीं 'पुरुष आयोग' बनाने की बात हो रही है तो कहीं शादी से दूर रहने के गुर सिखाए जा रहे हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया भी लगातार औरतों के खिलाफ माहौल तैयार करने में लगा है. तथाकथित संतों की वाणी में औरतों को ले कर भयंकर नफरत निकल कर सामने आ रही है. कहीं यह सारा प्रोपेगेंडा 1947 में मिली आजादी के बाद औरतों को मिले संवैधानिक अधिकारों को छीनने का प्रयास तो नहीं?

सोशल मीडिया पर अनिरुद्धाचार्य का वीडियो है जिस में उन से एक महिला ने सोनम रघुवंशी वाले मामले को ले कर एक सवाल पूछा कि महिलाएं ऐसा कदम क्यों उठा रही हैं तो अनिरुद्धाचार्य ने जवाब दिया, 'नारी का असली श्रृंगार उस का पति है. एक बार पति के नाम का सिंदूर मांग में पड़ जाए तो वह औरत उस की संपत्ति हो जाती है.'

इस तरह की घटिया मानसिकता से पूरा मर्द समाज ग्रसित है. औरतों को निजी संपत्ति मानने की यह सोच औरतों के खिलाफ एक गंभीर साजिश है. तमाम तरह के कौंस्टिट्यूशनल राइट्स के बावजूद भारत में औरतों की स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ तो इस की वजह यही पुरुषवादी मानसिकता है.

औरतों को कैसे मिलें संवैधानिक अधिकार

भारतीय संविधान लागू होने से पहले हिंदू समाज में पुरुष और महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं था. 1955 तक पुरुषों को एक से ज्यादा शादी करने की आजादी थी. हिंदू विधवाएं दोबारा विवाह नहीं कर सकती थीं. विधवाओं को कोई संपत्ति नहीं मिलती थी. 11 अप्रैल, 1947 को डा. अंबेडकर ने संसद में हिंदू कोड बिल नाम से महिला अधिकारों से संबंधित बिल पेश किया.

उस विधेयक में विधवा औरत को बेटों के साथ संपत्ति में बराबर का अधिकार देने का प्रावधान था. इस के अतिरिक्त, पुत्रियों को उन के पिता की संपत्ति में हिस्सा देने की भी व्यवस्था थी, साथ ही, विवाह संबंधी प्रावधानों में बदलाव किया गया था. यह दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था, संस्कारिक व सिविल. इस में हिंदू पुरुषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध था. तलाक संबंधी प्रावधान भी थे. सब से बड़ी बात यह थी कि पत्नी अपने पति से किन्हीं शर्तों पर तलाक ले सकती थी.

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