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अठारहवीं बार बिसात पर भारत का लोकतंत्र
Open Eye News
|March 2024
भारत का लोकतंत्र अठारहवीं बार बिसात पर है। लोकतंत्र को जीतने के लिए बाजियां लग रहीं है। कोई जान की बाजी लगा रहा है तो कोई ईमान की बाजी लगा रहा है। किसी ने आँखें खोलकर बाजी लगाने की तैयारी की है तो कोई आँखें बंद कर ब्लाइंड खेलने पर आमादा है।
सबकी अपनी-अपनी तैयारी है। किसी ने 2024 के लिए दांव लगाने का इंतजाम किया है और किसी की नजर 2047 पर है। यानि एक से बढ़कर एक योद्धा मैदान में हैं और बेचारे मतदाता की जान सांसत में है। लगता है जैसे वो खुद मोहरा है। सभी मिलजुलकर उसी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। भारत में चुनाव कोई नयी बात नहीं है। जब भारत आजाद नहीं था तब भी उसने चुनाव देखे हैं और आजाद होने के बाद से लगातार भारत और भारत का जनमानस चुनावों से गुजरता हुआ ही 1947 से 2024 तक आ पहुंचा है। चुनाव कराने के लिए भारत के पास एक केंद्रीय चुनाव आयोग है। इस आयोग को चुनाव लड़ने वाले और चुनाव में मोहरा बनने वाले लोग प्यार से केंचुआ कहते हैं, लेकिन मै ठहरा साहित्य का विद्यार्थी, इसलिए मै चुनाव आयोग को केंचुआ नहीं बल्कि भूमिनाग कहता हूँ। रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने भी केंचुए को भूमिनाग कहकर ही इज्जत बक्शी है। आप केंचुआ को दंतहीन,नखहीन या विषहीन कहें लेकिन केंचुआ है कि पूरे पांच साल चुनावों की तैयारी करता है। ये तैयारी युद्धस्तर की होती है और हर चुनाव के बाद नया चुनाव केंचुआ के लिए एक बड़ी चुनौती होता है, क्योंकि हर चुनाव में मतदाताओं की संख्या में घट-बढ़ होती रहती है। देश की विविधता तथा संस्कृति ही नहीं बल्कि भूगोल भी केंचुआ की तैयारियों को प्रभावित करता है। मतदान कराने के लिए मतदाताओं तक चुनाव लड़ने वाले पहुंचे या न पहुंचें लेकिन केंचुआ वहां तक पहुंचता है। इसलिए केंचुआ तमाम निन्दा और आलोचनाओं है के बावजूद प्रशंसा का पात्र भी है। केंचुआ पहा?, जंगल, नदीनाले, सर्दी, गर्मी, बरसात की तमाम बाधाओं को पार करने में सिद्धहस्त हो चुका है। समय के साथ केंचुआ की महारत भी लगातार बढ़ी है। देश में अठारहवीं बार संसद के लिए चुनाव करने जा रहे केंचुआ ने इस बार लगभग 97 करोड़ मतदाताओं को मताधिकार का इस्तेमाल कराने के लिए इंतजाम किये हैं ताकि झंझावातों में फंसा लोकतंत्र महफूज रह सके, उसका फ्यूज न उड़े। लोकतंत्र का फ्यूज उड़ाने की हालिया कोशिशों से सारा देश और दुनिया वाकिफ है, इसलिए इस पर
Cette histoire est tirée de l'édition March 2024 de Open Eye News.
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