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गुरु पूर्णिमा का महत्त्व

Sadhana Path

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July 2025

गुरु के समक्ष नतमस्तक होकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सर्वोत्तम दिन है गुरु पूर्णिमा। इस दिन गुरु पूजा करने का नियम है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था के तहत शिष्य इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपनी सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते थे। इसी दिन चारों वेदों के व्याख्याता वेद व्यास जी की प्रमुख रूप से पूजा की जाती है।

- - विजय शर्मा

गुरु पूर्णिमा का महत्त्व

वैसे तो गुरु के मौजूद रहने पर किसी भी दिन उनकी पूजा की जानी चाहिए। किंतु पूरे विश्व में आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन विधिवत गुरु की पूजा करने का विधान है। उस दिन हर शिष्य को अपने गुरु की पूजा कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहिए। (वर्ष की अन्य सभी पूर्णिमाओं में इस पूर्णिमा का महत्त्व सर्वाधिक है।) इस पूर्णिमा को इतनी श्रेष्ठता प्राप्त है कि इस एकमात्र पूर्णिमा का पालन करने से ही वर्ष भर की पूर्णिमाओं का फल प्राप्त होता है। गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है, जिसमें हम अपने गुरुजनों, महापुरुषों, माता-पिता एवं श्रेष्ठजनों के लिए कृतज्ञता और आभार व्यक्त करते हैं।

गुरु वास्तव में कोई व्यक्ति नहीं, वरन् उसके अंदर निहित आत्मा है। इस प्रकार गुरु की पूजा व्यक्ति विशेष की पूजा न होकर गुरु की देह में समाहित परब्रह्म परमात्मा और परब्रह्म ज्ञान की पूजा है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा विशेष रूप से गुरु पूजन का पर्व है। इस पर्व को 'व्यास पूर्णिमा' भी कहते हैं। उन्होंने वेदों का विस्तार किया और कृष्ण द्वैपायन से वेदव्यास कहलाये। इसी कारण इस गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। 16 शास्त्रों एवं 18 पुराणों के रचयिता वेदव्यास जी ने गुरु के सम्मान में विशेष पर्व मनाने के लिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को चुना। कहा जाता है कि इसी दिन व्यास जी ने शिष्यों एवं मुनियों को पहले-पहल श्री भागवत् पुराण का ज्ञान दिया था। अतः यह शुभ दिन व्यास पूर्णिमा कहलाया। व्यास जी ने सर्वप्रथम सूत जी को अपना शिष्य मानकर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। व्यास जी के बाद ऋषियों एवं मुनियों ने श्री शुक्रदेव जी को उनका स्थान प्रदान किया। जब कभी श्री भागवत पुराण का पाठ किया जाता है, तो सर्वप्रथम श्री शुकदेव जी का स्मरण किया जाता है। व्यास जी ने देश की वंदना करते हुए उसका दर्शन हमें जिस रूप में कराया, वह प्रत्येक भारतीय के लिए वंदनीय है।

इसी आषाढ़ मास की पूर्णिमा को छह शास्त्र तथा अठारह पुराणों के रचयिता वेदव्यास के अनेक शिष्यों में से पांच शिष्यों ने गुरु पूजा की परम्परा डाली। पुष्पमंडप में उच्चासन पर गुरु यानी व्यास जी को बिठाकर पुष्प मालाएं अर्पित कीं, आरती की तथा अपने ग्रंथ अर्पित किए। तब से शताब्दियां बीत गईं। गुरु को अर्पित इस पर्व की संज्ञा गुरु पूर्णिमा ही हो गई।

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