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धागों में बंधा रक्षाकवच है रक्षाबंधन
Sadhana Path
|August 2022
सभी त्योहारों में रक्षा बंधन एक अनुठा उत्सव है, जो न तो किसी जयंती से संबंधित है और न ही किसी विजय राज तिलक से। इस त्योहार के तीन नाम हैं- रक्षाबंधन, वष तोड़क और पुण्य प्रदायक पर्व। यद्यपि प्रथम नाम अधिक प्रचलित है। रक्षाबंधन ऐसा प्रिय बंधन है जिसमें हर भाई अपनी बहन के प्यार में बंधना चाहता है। यह बंधन ईश्वरीय बंधन है इसलिए प्रत्येक प्राणी खुशी से बंधने के लिए तैयार रहता है।
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वास्तव में बंधन शब्द प्रतिज्ञा का प्रतीक है और रक्षा मनोविकारों से बचाव का प्रतीक है। तिलक आत्मिक स्मृति का प्रतीक हैं। राखी का धागा प्रतिज्ञा में दृढ़ता का प्रतीक हैं, परस्पर अटूट स्नेह का प्रतीक है। गीता में कहा गया है- 'कि जब संसार में नैतिक मूल्यों की कमी आने लगती है तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव, प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहने मंगलकामना करते हुए भाइयों को बांधती है और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं।'
रक्षाबंधन का इतिहास
रक्षाबंधन के ऐतिहासिक व धार्मिक महत्त्व में व्यक्ति की सुरक्षा, सफलता तथा सुखमय विकास का भाव निहित है। इस त्योहार को भारत में स्त्री की रक्षा के लिए तो सर्वोपरि माना ही गया है। साथ ही स्त्री ने देवताओं की रक्षा के लिए रक्षाबंधन का त्योहार रचा। श्रावण मास में शिव की आराधना से जुड़ा यह त्योहार भी उससे पृथक नहीं है । शिव की निरंतर आराधना तथा धर्म की मर्यादा के लिए माता पार्वती ने भगवान शिव को कहा- 'कि देवताओं को कोई ऐसा सूत्र दीजिए जिससे इनकी रक्षा हो सके। देवी के वचन सुनने के बाद भगवान शंकर ने रक्षासूत्र दिया। जिसको माता पार्वती ने सभी देवताओं की कलाई पर बांधा।' इसी को रक्षा सूत्र कहा गया है। सूत्र का अर्थ धागे से भी है और सिद्धांत से भी । द्रौपदी ने भी अपनी साड़ी का धागा निकालकर कृष्ण की कलाई पर बांधा था और कृष्ण ने अपने वचनानुसार कौरव सभा में द्रौपदी की रक्षा कर लाज बचाई थी।
इसी तरह ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन मनाए जाने के पीछे भी एक पंरपरा रही है। कहा जाता है - 'कि जब राजपूत राजा युद्ध पर जाते थे, तो घर की महिलाएं उनके माथे पर सिंदूर का तिलक लगाकर हाथ में रक्षा सूत्र बांधा करती थीं। ऐसा करने के पीछे उन का विश्वास था कि रक्षा सूत्र दुश्मन से उनकी रक्षा करेगा और ये विजयी होकर वापस लौटेंगे। उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए अब भी बहने जीवन संघर्ष में भाइयों की सफल होने की कामना करतीं है।
Cette histoire est tirée de l'édition August 2022 de Sadhana Path.
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