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भगवद्रस ऐसा सुखदायी है!

Rishi Prasad Hindi

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December 2024

रामायण में शिवजी बोलते हैं : उमा राम सुभाउ जेहिं जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥ (रामचरित. सुं.कां.: ३३.२)

- पूज्य बापूजी

भगवद्रस ऐसा सुखदायी है!

राम कहो, कृष्ण कहो, शिव कहो... उस अंतर्यामी परमेश्वर का स्वभाव जिसने जाना वह बार-बार उसके रस में रसमय हो जाता है।

किं लक्षणं भजनम् ?

रसनं लक्षणं भजनम्।

आत्मा का रस आ जाय, परमेश्वर का रस आ जाय, व्यक्ति को विकारी रस से बचने का अवसर मिल जाय इसका नाम है भजन।

भगवान की स्मृति से रस आता है। उस रस के आगे दुनियावी रस तुच्छ है। ईश्वर के प्रति अपनत्व का रस अर्थात् ईश्वर को अपना, अपने को ईश्वर का मानना। यह रस आते-आते भाव रस, भक्ति रस, शांत रस, परमात्म- रस... मूल रस तक पहुँच जायेंगे।

भगवान कैसे हैं? तैत्तिरीय उपनिषद् में आता है : रसो वै सः। 'वह (परमात्मा) निश्चय ही रसस्वरूप है।'

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