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चल दिये तो चल दिये...

Rishi Prasad Hindi

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October 2024

आत्मा के बाहर मत भटको। बाहर तुम्हारा कोई नहीं था, कोई नहीं है, कोई नहीं रहेगा। अपने केन्द्र में स्थित रहो, अपने आपे में आओ। पराये गाँव में कब तक भटकोगे? 'जरा यह कर लूँ, जरा वह कर लूँ...' आग लगा पेट्रोल डाल के। 'मैं और मेरे' पन को आग लगा दे मन से। ज्ञान पाना है कि बस संसार का टट्टू चलाते रहना है? ऐ जगत ! बस हो गया, तू कितने जन्मों से हमको भटकाता आया है !

- पूज्य बापूजी

चल दिये तो चल दिये...

आजकल के लोगों में त्याग का बल ही नहीं है, क्या पता क्यों? इतना-इतना सुनते हैं। फिर भी... राजा भर्तृहरि ने जरा-सा सुना, राज्य छोड़ के चल दिये।

एक राजकुमार स्नान कर रहा था। नयी-नयी शादी हुई थी, पत्नियाँ बहुत थीं। कोई हाथ में गंगाजल लिये खड़ी है तो कोई कुछ और कर रही है। जो पटरानी थी वह मुलतानी मिट्टी से स्नान करा रही थी, ठंडे-ठंडे पानी की धार कर रही थी। एकाएक उसकी आँखों से आँसू टपके, राजकुमार की पीठ पर गिर गये दो आँसू। राजकुमार ने देखा तो पूछा कि “क्यों रोती है?”

बोली : ''मेरा चचेरा भाई कान में कह गया है कि ‘तुम्हारा भाई कहता है कि 'मैं जा रहा हूँ साधु होने को, फकीरी पाऊँगा। मुँह देखना है तो आ जा।' एक-का- एक है मेरा भाई और वह भी साधु होने जा रहा है।”

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