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Jansatta
|June 29, 2025
अपनी नई पोस्टिंग से सुजीत बहुत ही खुश थे। शहर का नाम सुनते ही उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। सोने पर सुहागा हो गया, जब उन्होंने जाकर देखा कि पुलिस स्टेशन एक शोध संस्थान के बगल में ही था। नौकरी लग जाने के कारण वह अधिक पढ़ाई नहीं कर पाए थे, लेकिन हमेशा से ही उनका सपना रहा था शोध संस्थान में जाना।
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बेटे रोहन की परीक्षाएं अभी खत्म नहीं हुई थीं, इसलिए उनकी पत्नी सीमा पुराने शहर में ही रुक गई। उन्हें अकेले ही नए शहर में जाना पड़ा। ड्यूटी पर उनका दूसरा ही दिन था कि शोध संस्थान के एक छात्र ने पुलिस चौकी पर आकर एफआइआर दर्ज कराई। उसका आरोप था कि उसके निर्देशक ने उसके शोध पत्र को अपने नाम से एक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित करवा लिया है। सुजीत को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि कोई शिष्य भी अपने गुरु पर एफआइआर कर सकता है। उनके सामने इस तरह का यह पहला ही केस था। शोध संस्थान की जो छवि उनके मन में बनी थी उसे भी धक्का लगा। शोध संस्थान का ऐसा चेहरा भी हो सकता है, सुजीत के लिए विश्वास करना मुश्किल हो रहा था। आए हुए भी कम ही समय हुआ था, इसलिए व्यस्तता भी अधिक थी।
उस दिन कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। घर पहुंचकर खाना भी नहीं खाया था कि दरवाजे की घंटी बजी। थोड़ा गुस्सा भी आया क्योंकि भूख लगी थी। जैसे तैसे थोड़ा बहुत बना पाए थे। फिर भी कदम दरवाजे की ओर बढ़ गए। दरवाजा खोला तो एक सज्जन सामने खड़े थे। सुजीत के कहने से पहले ही वे कमरे के अंदर आ गए। काफी परेशान लग रहे थे। सुजीत ने उन्हें कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। आने का कारण पूछने ही वाला था कि उन्होंने बोलना शुरू कर दिया।
'आप मुझे नहीं जानते हैं, इंस्पेक्टर साहब। मेरा नाम श्रीराम शंकर है। मैं शोध संस्थान में प्रोफेसर पद पर कार्यरत हूं। आज मेरे ही एक छात्र ने मेरे विरुद्ध थाने में एफआइआर दर्ज करवाई है।' अब सुजीत को उनके आने का कारण समझ में आ गया। उसने उन्हें समझाने की कोशिश करते हुए कहा।
'आपने बेकार ही तकलीफ की सर। यदि आप के ऊपर गलत आरोप लगाया गया है तो कोई भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। बस थोड़ा धैर्य रखिए।' प्रोफेसर साहेब काफी असहज लग रहे थे। कुर्सी से उठे और एक लिफाफा सुजीत की ओर बढ़ाया।
उन्होंने कहा, 'आप मेरी बात का विश्वास कीजिए इंस्पेक्टर साहब। यह एफआइआर झूठी है। मैं एकदम निर्दोष हूं। कल वो पेपर आपके पास भिजवा दूंगा जिसमें पांच लोगों के हस्ताक्षर हैं। पांच लोगों ने मिलकर उस शोध पत्र को लिखा है। लिखने का काम अमरदीप ने किया है। मैंने और मेरे तीन विद्यार्थियों ने शोध पत्र लिखने लायक सामग्री एकत्र की है।' सुजीत को बात समझ में आ रही थी लेकिन थाने की बात घर पर कैसे सुलझा सकते थे?
Diese Geschichte stammt aus der June 29, 2025-Ausgabe von Jansatta.
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