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ऊर्जा सुरक्षा में समानता का सवाल
Jansatta Lucknow
|June 16, 2026
प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि देश में बिजली उत्पादन कितना है, बल्कि यह भी है कि उसका लाभ कितनी समानता के साथ मिल रहा है। ऊर्जा के वितरण में न्याय का होना भी जरूरी है।
भारत की ऊर्जा नीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उपलब्धियों के चमकदार आंकड़े और वितरण की जमीनी वास्तविकताएं साथ-साथ दिखाई देती हैं।
पिछले एक दशक में देश ने बिजली उत्पादन, ग्रिड विस्तार और अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मगर किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए असली प्रश्न केवल यह नहीं होता कि वह कितनी बिजली पैदा कर रहा है, बल्कि यह भी होता है कि उस बिजली का लाभ किसे और कितनी समानता के साथ मिल रहा है। इसी बिंदु पर उत्पादन और वितरण, उपलब्धि एवं अधिकार और विकास तथा समानता के प्रश्न एक-दूसरे से टकराते हैं। ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में मिली सफलताओं को ऊर्जा न्याय में बदल पाना आज भारतीय ऊर्जा नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।
बिजली उत्पादन के मोर्चे पर उपलब्धियां निर्विवाद हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और विद्युत मंत्रालय के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 5,20,511 मेगावाट तक पहुंच चुकी थी, जो वर्ष 2013-14 के लगभग 224 गीगावाट के स्तर की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। कुल स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 52 फीसद से ऊपर पहुंच चुकी है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 273 गीगावाट के आस-पास है। पिछले वित्तीय वर्ष के शुरुआती दस महीनों में 52,537 मेगावाट नई क्षमता जोड़ी गई, जिसमें अधिकांश योगदान अक्षय ऊर्जा का रहा। राष्ट्रीय ग्रिड अब 242 गीगावाट की रेकार्ड मांग को संभालने में सक्षम है। इन उपलब्धियों ने भारत को वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के अग्रणी देशों में शामिल किया है, लेकिन क्या राष्ट्रीय ग्रिड की यह प्रचुरता हर नागरिक के लिए भी उतनी ही वास्तविक और विश्वसनीय है, जितनी वह सरकारी आंकड़ों में दिखाई देती है?
Diese Geschichte stammt aus der June 16, 2026-Ausgabe von Jansatta Lucknow.
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