अरावली के संरक्षण की मुश्किल राह
Jansatta Lucknow
|January 02, 2026
अरावली कई दशकों से मानवीय दबाव झेल रही है। पत्थर और चूना-पत्थर की निरंतर निकासी ने कई पहाड़ियों को कमजोर कर दिया है। जंगलों का नुकसान हुआ है। आसपास के शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ती गई है।
अरावली पर्वत श्रृंखला एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। इस बार बहस का कारण केवल खनन नहीं, बल्कि वह नई न्यायिक स्थिति है जो सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद बनी है। न्यायालय ने बीते 20 नवंबर के अपने आदेश पर रोक लगाते हुए यह स्पष्ट किया है कि 21 जनवरी 2026 तक अरावली क्षेत्र में खनन पर प्रतिबंध जारी रहेगा।
इसके साथ ही एक नई उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया गया है, जो पहले से नियुक्त समिति की रपट तथा न्यायालय की टिप्पणियों का स्वतंत्र और निष्पक्ष मूल्यांकन करेगी। न्यायालय ने यह भी कहा है कि पिछली सिफारिशें और उन पर आधारित उसकी टिप्पणियां फिलहाल स्थगित रहेंगी और अगली सुनवाई तक लागू नहीं की जाएंगी। पहली नजर में यह निर्णय सावधानी भरा, संतुलित और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में विचारणीय कदम प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कोई भी व्यवस्था लागू होने से पहले उसका वैज्ञानिक, सामाजिक और कानूनी परीक्षण अवश्य हो।
फिर भी यह सवाल कायम है कि इतनी स्पष्टता के बाद भी अरावली पर विवाद और विरोध क्यों जारी है। इसका उत्तर उस गहरी दूरी में छिपा है जो नीति के इरादों और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच बनी रहती है। कई लोगों को डर है कि यदि निगरानी और प्रवर्तन कमजोर रहा, तो कोई भी नई व्यवस्था केवल कागजों में सुशोभित होकर रह जाएगी, जबकि जमीन पर पुराने ढरें ही चलते रहेंगे।
Diese Geschichte stammt aus der January 02, 2026-Ausgabe von Jansatta Lucknow.
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