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'जादुई आविष्कार' सिनेमा में क्यों नहीं लग पाया था प्रेमचंद का मन?

Dainik Bhaskar Chhatarpur

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November 02, 2025

'जिन हाथों में फिल्म की किस्मत है, वे बदकिस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। इंडस्ट्री को न तो प्रयोग से वास्ता है और न ही सुधार से। वह तो एक्सप्लाइट करना जानती है और यहां इंसान के मुकद्दसतरीन (पवित्रतम) जज्बात को एक्सप्लाइट कर रही है।'

- ध्रुव हर्ष

ये प्रेमचंद के शब्द हैं। इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे अपने लेखन को लेकर कितने संजीदा और ईमानदार थे। वे लेखक होने की जिम्मेदारी को बखूबी समझते थे, इसलिए उनका लेखन कुछ भी महज कह लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस दौर की प्रतिनिधि आवाज बनकर उभरा। नहीं तो 'सोजे वतन' (1910) लिखने के बाद उन पर अंग्रेज बहादुर देशद्रोह का मुकदमा न चलाते। वह तीखी-से-तीखी बात भी बड़े सहज होकर कहते। यदि उनके वाक्य-विन्यास व शब्द संरचना की बात करें तो उनकी लेखनी में किसी कुशल पटकथाकार की तरह देसी और दृश्यात्मक तत्वों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

खैर, उनका फिल्मों में सफल न होना एक अलग विषय है। और वह भी किसी एक फिल्म से प्रेमचंद जैसे महान लेखक की सफलता और असफलता का आकलन नहीं किया जा सकता। साहित्य लेखन में अच्छा खासा मुकाम हासिल करने के बाद उन्होंने फिल्मों की तरफ रुख किया था। वजह आर्थिक तंगी थी या कि सिनेमा ने वाकई में उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया था, यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है।

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