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डिजाइन को नागरिक कौशल के तौर पर देखें
Business Standard - Hindi
|December 31, 2025
भारत के शहर तेजी से विकास कर रहे हैं और रोजमर्रा के जीवन में नए रूपों में अपनी उपस्थिति का एहसास करा रहे हैं।
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शहरी परिदृश्य असाधारण गति से तैयार हो रहा है मगर इसे आकार देने वाली संस्थाएं इसकी रफ्तार के साथ तालमेल बैठाने में मुश्किलों का सामना कर रही हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लगभग हर महानगर में तनाव साफ नजर आ रहा है। शहरों की बनावट से जुड़ी समस्या स्पष्ट नजर आ रही है और संबंधित संस्थागत तंत्र उनका व्यापक स्तर पर समाधान खोजने के मामले में बहुत विवश महसूस कर रहा है। लिहाजा शहरों के ढांचे बेहतर बनाने के लिए बेहतर डिजाइन या चुस्त दिशानिर्देशों से कहीं बेहतर करने की जरूरत है। इसके लिए खुद राज्य की डिजाइन क्षमता का निर्माण करने की आवश्यकता है ताकि अच्छे विचार उन प्रक्रियाओं एवं औपचारिकताओं से बाधित न हो जिनका उद्देश्य उन्हें मुकाम तक पहुंचाना है।
चुनौती तब और बढ़ जाती है जब कोई इस बात की पड़ताल करता है कि भारत के शहरी भविष्य का ढांचा तैयार करने की उम्मीद किससे लगाई जा रही है। कुछ वर्ष पहले 'यूएन-हैबिटेट' ने अनुमान लगाया था कि भारत में प्रति 1,00,000 लोगों पर केवल 0.23 शहरी योजनाकार हैं जबकि ब्रिटेन में प्रति 1,00,000 लोगों पर इनकी संख्या 38 हैं। यह आंकड़ा नाइजीरिया से भी कम हैं जहां यह अनुपात लगभग 1.4 है। टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर केवल 3,945 स्वीकृत शहरी योजनाकार के पद हैं। लगभग 8,000 शहरी केंद्रों वाले देश के लिए यह कमी चौंका देने वाली है। नीति आयोग के 2021 के आकलन में पाया गया कि भारत के आधे से अधिक वैधानिक कस्बों में कोई मास्टर प्लान नहीं है और लगभग तीन चौथाई जनगणना कस्बों का शहरीकरण किसी भी औपचारिक स्थानिक ढांचे के अभाव में हुआ है। शहरी योजनाकारों की अनुपस्थिति कहानी का केवल एक हिस्सा है। भारत की शहर बनाने वाली मशीनरी, बजट, खरीद, रखरखाव, विभागीय समन्वय इस तरह से तैयार किया गया है कि वे अक्सर शहरी रूपरेखा के इरादे को दरकिनार, कमजोर या पलट देते हैं। शहर जानते हैं कि क्या तैयार करना है, मगर कैसे तैयार करना है यह सवाल उन्हें पीछे धकेल देता है।
Diese Geschichte stammt aus der December 31, 2025-Ausgabe von Business Standard - Hindi.
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