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मजदूरों से काम छीनता एआईः विकल्प कहाँ है?
Aaj Samaaj
|May 01, 2025
तकनीक के इस करिश्माई दौर में जहां एक ओर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) दुनिया को अधिक तेज, कुशल और उत्पादक बना रहा है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों असंगठित मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो रहा है। संकट भी ऐसा है जिसकी न तो ज्यादा चर्चा हो रही है और न ही विरोध। एआई पूरी दुनिया में काम के मायने बदल रहा है। भारत जैसा किसान और मजदूर बहुल देश भी इससे अछूता नहीं है।
हर साल की तरह इस साल भी मजदूर दिवस मनाने की तैयारी है। हर साल एक मई को मजदूर दिवस के आयोजनों में मेहनतकश लोगों के संघर्षों, अधिकारों और योगदान को याद किया जाता है लेकिन 2025 का मजदूर दिवस मेहनतकशों के लिए नई चुनौतियां लिए खड़ा है। तकनीक के इस करिश्माई दौर में जहां एक ओर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) दुनिया को अधिक तेज, कुशल और उत्पादक बना रहा है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों असंगठित मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो रहा है। संकट भी ऐसा है जिसकी न तो ज्यादा चर्चा हो रही है और न ही विरोध। एआई पूरी दुनिया में काम के मायने बदल रहा है। भारत जैसा किसान और मजदूर बहुल देश भी इससे अछूता नहीं है। बड़ा सवाल है कि काम के बदलते स्वरूप के इस दौर में कामगारों मजदूरों का भविष्य क्या होगा? एआई ऐसी मशीनों का नाम है जो सोच-समझ सकती हैं, फैसले ले सकती हैं और इंसानों की तरह काम कर सकती हैं। वर्तमान में एआई बैंक से लेकर अस्पताल, स्कूल से लेकर कारखानों तक हर जगह दस्तक दे चुका है। एआई से हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों को नया स्वरूप मिल रहा है, दक्षता बढ़ रही है, विभिन्न सेवाओं में सुधार हो रहा है। यकीनन, इससे एक ओर उत्पादकता बढ़ी है लेकिन दूसरी ओर करोड़ों मजदूरों के लिए रोजगार का संकट गहरा हुआ है। खासकर, असंगठित क्षेत्र के मेहनतकश की आजीविका पर ज्यादा खतरा है। भारत में लगभग 90 फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 से पता चलता है कि वर्ष 2019-20 के दौरान देश में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की कुल संख्या लगभग 43.99 करोड़ थी। इनके पास न स्थायी नौकरी है और न ही सामाजिक सुरक्षा। इनमें खेतिहर मजदूर, निर्माण श्रमिक, घरों में काम करने वाले लोग, फैक्ट्रियों के कर्मचारी, रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा, ऑटो रिक्शा चालक शामिल हैं। इनमें हाल के सालों में गिग इकॉनमी से जुड़े डिलीवरी बॉय भी शामिल हो गए हैं, जो हर तरह का सामान डिलीवर करने हमारे घरों तक आते हैं। ये लोग देश की आर्थिक रीढ़ हैं लेकिन तकनीकी बदलावों की सबसे बड़ी मार इन्हीं पर पड़ रही है। पारंपरिक रूप से श्रम प्रधान रहे हमारे देश में आज भी कपड़ा, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रोनिक्स जैसे उद्योगों में बड़ी तादाद मैन्युअली काम करने वाले कम कुशल और अर्द्ध कुशल श्रमिकों की है। इनका क्या होगा? एआई जितनी तेजी से हमारे
Diese Geschichte stammt aus der May 01, 2025-Ausgabe von Aaj Samaaj.
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