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वनों की कटाई विनाश को बुलावा

Outlook Hindi

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September 29, 2025

सरकार की नीयत अपने हरित क्षेत्र की रक्षा करने की नहीं दिखती, उसका ध्यान व्यावसायिक दोहन पर ज्यादा दिखता है, सो प्रकृति का कोप बढ़ रहा

- नंदिनी केशरी

वनों की कटाई विनाश को बुलावा

अपने कुल वृक्षाच्छादित यानी वन क्षेत्र का लगभग 15 प्रतिशत देश पिछले दो दशकों में खो चुका है। ऑनलाइन निगरानी संस्था ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक, 2002 से अब तक 3,48,000 हेक्टेयर से ज्यादा बारिश वन खत्म हो चुके हैं। उनमें 18,000 तो 2024 में ही गायब हो गए। ये सिर्फ वन नहीं, बल्कि घने, सदियों पुराने पर्यावरण तंत्र हैं, जो कार्बन का भंडारण करते हैं, वर्षा को नियंत्रित करते हैं और हजारों प्रजातियों की रिहाइश की जिम्मेदारी उठाते हैं। 2001 से वन देश में हर साल औसतन 8.03 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर रहे हैं। वन क्षेत्र में गिरावट देश के राष्ट्रीय स्तर पर तय योगदान के तहत 2030 तक 2.5-3 अरब टन कार्बन उत्सर्जन घटाने के संकल्प को कमजोर करता है। वनों की कटाई का मौजूदा रुझान जारी रहा, तो विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यह वादा पूरा नहीं हो पाएगा। अनुमान है कि भारत का कुल कार्बन भंडार 6.13 गीगाटन है, जिसका अधिकांश हिस्सा जैव ईंधन के रूप में भूगर्भ में है। जब वनों का सफाया होता है, तो यह कार्बन वापस वायुमंडल में चला जाता है।

अलबत्ता देश में वनों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और कार्यक्रमों की लंबी सूची है। मसलन, वन संरक्षण अधिनियम, संयुक्त वन प्रबंधन, वन अधिकार अधिनियम, हरित भारत मिशन और प्रतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन तथा योजना प्राधिकरण वगैरह। कागजों पर ये कानून और व्यवस्था सख्त नजर आती है लेकिन जमीन पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है।

वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य वनवासियों के अधिकारों और उनकी रिहाइश को बहाल करना है, क्योंकि पहले के कानूनों के तहत उनके अधिकारों में कटौती की गई थी। लेकिन वनाधिकार को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्ष जारी है। कई मामलों में वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों को अभी भी न पूरी तरह पट्टा मिला है, न वन भूमि के उपयोग और संरक्षण से जुड़े फैसलों पर उनसे पूछा जाता है। लिहाजा, आदिवासियों के विस्थापन के साथ- साथ जंगलों की भी बड़े पैमाने पर कटाई हो रही है।

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